मुण्डक 1 खण्ड 2 - मन्त्र 13

तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक्प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय ।
येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३ ॥

tasmai sa vidvānupasannāya samyakpraśāntacittāya śamānvitāya .
yenākṣaraṃ puruṣaṃ veda satyaṃ provāca tāṃ tattvato brahmavidyām .. 13 ..


वह विद्वान् गुरु अपने समीप आये हुए उस पूर्णतया शान्तचित्त एवं जितेन्द्रिय शिष्य को उस ब्रह्मविद्या का तत्त्वतः उपदेश करे जिससे उस सत्य और अक्षर पुरुष का ज्ञान होता है ॥ १३ ॥
वह विद्वान्—ब्रह्मवेत्ता गुरु अपने समीप आये हुए उस सम्यक्— यथाशास्त्र प्रशान्तचित्त—गर्व आदि दोषों से रहित तथा शमसम्पन्न—बाह्य इन्द्रियों की उपरति से युक्त और सब ओर से विरक्त हुए शिष्य को, जिस विज्ञान अथवा जिस परा विद्या से उस अद्रेश्यादि विशेषणवाले तथा पूर्ण होने या शरीररूप पुर में शयन करने के कारण ‘पुरुष’ शब्दवाच्य अक्षर को, जो क्षरण (च्युत होना), क्षत (व्रण) और क्षय (नाश) से रहित होने के कारण ‘अक्षर’ कहलाता है, जानता है उस ब्रह्मविद्या का तत्त्वतः— यथावत् उपदेश करे—यह इसका भावार्थ है । आचार्य के लिये भी यही नियम है कि न्यायानुसार अपने समीप आये हुए सच्छिष्य को अविद्यामहासमुद्र से पार कर दे ॥ १३ ॥
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तस्मै स विद्वान् गुरुर्ब्रह्मविद् उपसन्नायोपगताय सम्यग्यथाशास्त्रमित्येतत्, प्रशान्तचित्ताय उपरतदर्पादिदोषाय शमान्विताय बाह्येन्द्रियोपरमेण च युक्ताय सर्वतो विरक्तायेत्येतत् । येन विज्ञानेन यया विद्यया परयाक्षरमद्रेश्यादिविशेषणं तदेवाक्षरं पुरुषशब्दवाच्यं पूर्णत्वात् पुरि शयनाच्च सत्यं तदेव परमार्थस्वाभाव्यादक्षरं चाक्षरणादक्षतत्वादक्षयत्वाच्च वेद विजानाति तां ब्रह्मविद्यां तत्त्वतो यथावत् प्रोवाच प्रब्रूयादित्यर्थः । आचार्यस्याप्ययं नियमो यन्न्यायप्राप्तसच्छिष्यनिस्तारणमविद्यामहोदधेः ॥ १३ ॥

इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये प्रथममुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥

समाप्तमिदं प्रथमं मुण्डकम् ॥ १ ॥


द्वितीय मुण्डक

प्रथम खण्ड

यहाँ तक अपरा विद्या का सारा कार्य कहा । यही संसार है; उसका जो सार है, जिस अपने मूलभूत अक्षर से वह उत्पन्न होता है और जिसमें उसका लय होता है वह पुरुषसंज्ञक अक्षरब्रह्म ही सत्य है, जिसका ज्ञान होने पर यह सब कुछ जान लिया जाता है, वह परा विद्या का विषय है । उसे बतलाना है, इसीलिये आगे का ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है—
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अपरविद्यायाः सर्वं कार्यमुक्तम् ।

वक्ष्यमाणग्रन्थस्य स च संसारो यत्सारो प्रयोजनम् यस्मान्मूलादक्षरात् सम्भवति यस्मिंश्च प्रलीयते तदक्षरं पुरुषाख्यं सत्यम् । यस्मिन् विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति तत्परस्या ब्रह्मविद्याया विषयः स वक्तव्य इत्युत्तरो ग्रन्थ आरभ्यते—