मुण्डक 1 खण्ड 2 - मन्त्र 2

यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने ।
तदाज्यभागावन्तरेणाहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २ ॥

yadā lelāyate hyarciḥ samiddhe havyavāhane .
tadājyabhāgāvantareṇāhutīḥ pratipādayet .. 2 ..


जिस समय अग्नि के प्रदीप्त होने पर उसकी ज्वाला उठने लगे उस समय दोनों आज्यभागों के [*] मध्य में [प्रातः और सायंकाल] आहुतियाँ डाले ॥ २ ॥
जिस समय सब ओर आधान किये हुए ईंधन द्वारा सम्यक् प्रकार से इद्ध अर्थात् प्रज्वलित होने पर अग्नि से ज्वाला उठने लगे तब-उस समय ज्वालाओं के चंचल हो उठने पर आज्यभागों के अन्तर-मध्य में आवापस्थान में देवताओं के उद्देश्य से आहुतियाँ देनी चाहिये । अनेक दिन तक होनेवाले प्रयोग की अपेक्षा से यहाँ ‘आहुती: ’ इस बहुवचन का प्रयोग किया गया है ॥ २ ॥
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यदैवेन्धनैरभ्याहितैः सम्यगिद्धे समिद्धे हव्यवाहने लेलायते चलत्यर्चिस्तदा तस्मिन्काले लेलायमाने चलत्यर्चिष्याज्यभागावाज्यभागयोरन्तरेण मध्य आवापस्थान आहुतीः प्रतिपादयेत्प्रक्षिपेद्देवतामुद्दिश्य । अनेकाहप्रयोगापेक्षयाहुतीरिति बहुवचनम् ॥ २ ॥

विधिहीन कर्म का कुफल

यह यथाविधि आहुतिप्रदानरूप कर्ममार्ग [स्वर्गादि] लोकों की प्राप्ति का साधन है । इसका यथावत् होना बड़ा ही दुष्कर है । इसमें अनेकों विपत्तियाँ आ सकती हैं । किस प्रकार? [सो बतलाते हैं] जिस अग्निहोत्री का अग्निहोत्र अदर्श-दर्श नामक कर्म से रहित होता है, क्योंकि अग्निहोत्रियों को दर्शकर्म अवश्य करना चाहिये । अग्निहोत्र से सम्बन्ध रखनेवाला होने के कारण [यह दर्शकर्म] अग्निहोत्र के विशेषण के समान प्रयुक्त हुआ है । अतः जिसके द्वारा इसका अनुष्ठान नहीं किया जाता । इसी प्रकार ‘अपौर्णमासम्’ आदि में भी अग्निहोत्र का विशेषणत्व देखना चाहिये, क्योंकि अग्निहोत्र के अंग होने में उन [पौर्णमास आदि] की दर्श से समानता है । [अतः जिनका अग्निहोत्र] अपौर्णमास-पौर्णमास कर्म से रहित, अचातुर्मास्य-चातुर्मास्य कर्म से रहित, अनाग्रयण-शरदादि ऋतुओं में [नवीन अन्न से] किया जानेवाला जो आग्रयण कर्म है वह जिस (अग्निहोत्र) का नहीं किया जाता वह अनाग्रयण है, तथा अतिथिवर्जित-जिसमें नित्यप्रति अतिथिपूजन नहीं किया गया, ऐसा होता है और जो स्वयं भी, जिसमें विधिपूर्वक अग्निहोत्रकाल में हवन नहीं किया गया, ऐसा है तथा जो अदर्श आदि के समान अवैश्वदेव-वैश्वदेवकर्म से रहित है और यदि [उसमें] हवन भी
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एष सम्यगाहुतिप्रक्षेपादिलक्षणः कर्ममार्गो लोकप्राप्तये पन्थास्तस्य च सम्यक्करणं दुष्करम् । विपत्तयस्त्वनेका भवन्ति । कथम्?