मुण्डक 1 खण्ड 2 - मन्त्र 3

यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च ।
अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान्हिनस्ति ॥ ३ ॥

yasyāgnihotramadarśamapaurṇamāsamacāturmāsyamanāgrayaṇamatithivarjitaṃ ca .
ahutamavaiśvadevamavidhinā hutamāsaptamāṃstasya lokānhinasti .. 3 ..


जिसका अग्निहोत्र दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य और आग्रयण-इन कर्मों से रहित, अतिथि-पूजन से वर्जित, यथासमय किये जानेवाले हवन और वैश्वदेव से रहित अथवा अविधिपूर्वक हवन किया होता है, उसकी मानो सात पीढ़ियों का वह नाश कर देता है ॥ ३ ॥

किया गया है तो अविधिपूर्वक ही किया गया है, यानी यथोचित रीति से जिसमें हवन नहीं किया गया ऐसा है; इस प्रकार अनुचित रीति से किया हुआ अथवा बिना किया हुआ अग्निहोत्र आदि से उपलक्षित कर्म क्या करता है? सो बतलाया जाता है-

वह कर्म केवल परिश्रममात्र फलवाला होने के कारण उस कर्ता के सातों-सप्तम लोकसहित सम्पूर्ण लोकों को नष्ट-विध्वस्त-सा कर देता है । कर्मों का यथावत् अनुष्ठान किया जाने पर ही कर्मफल के अनुसार भूर्लोक से लेकर सत्यलोकपर्यन्त सात लोक फलरूप से प्राप्त होते हैं । वे लोक इस प्रकार के अग्निहोत्रादि कर्म से तो अप्राप्य होने के कारण मानो नष्ट ही कर दिये जाते हैं । हाँ, उसका परिश्रममात्र फल तो अव्यभिचारी-अनिवार्य है, इसीलिये ‘हिनस्ति’ [अर्थात् वह अग्निहोत्र उसके सातों लोकों को नष्ट कर देता है] ऐसा कहा है ।

अथवा पिण्डदानादि अनुग्रह के द्वारा यजमान से सम्बद्ध पिता, पितामह और प्रपितामह [ये तीन पूर्वपुरुष] तथा पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र [ये तीन आगे होनेवाली सन्ततियाँ ये ही अपने सहित] अपना उपकार करनेवाले सात लोक हैं । ये उक्त प्रकार के अग्निहोत्र आदि से प्राप्त नहीं होते; इसलिये ‘नष्ट कर दिये जाते हैं’ इस प्रकार कहा जाता है ॥ ३ ॥

[ * ]: दर्श-पौर्णमास यज्ञ में आहवनीय अग्नि के उत्तर और दक्षिण ओर ‘अग्नये स्वाहा’ तथा ‘सोमाय स्वाहा’ इन मन्त्रों से दो घृताहुतियाँ दी जाती हैं । उन्हें आज्यभाग कहते हैं । इनके बीच का भाग ‘आवापस्थान’ कहलाता है । शेष सब आहुतियाँ उसी में दी जाती हैं ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यस्याग्निहोत्रिणोऽग्निहोत्रमदर्शं दर्शाख्येन कर्मणा वर्जितम् । अग्निहोत्रिणोऽवश्यकर्तव्यत्वाद् दर्शस्य । अग्निहोत्रसम्बन्ध्यग्निहोत्रविशेषमिव भवति । तदक्रियमाणमित्येतत् । तथापौर्णमासम् इत्यादिष्वप्यग्निहोत्रविशेषणत्वं द्रष्टव्यम्, अग्निहोत्राङ्गत्वस्य अविशिष्टत्वात् । अपौर्णमासं पौर्णमासकर्मवर्जितम्, अचातुर्मास्यं चातुर्मास्यकर्मवर्जितम्, अनाग्रयणमाग्रयणं शरदादिकर्तव्यं तच्च न क्रियते यस्य, तथातिथिवर्जितं चातिथिपूजनं चाहन्यहन्यक्रियमाणं यस्य, स्वयं सम्यगग्निहोत्रकालेऽहुतम्, अदर्शादिवदवैश्वदेवं वैश्वदेवकर्म- वर्जितम्, हूयमानमप्यविधिना हुतं न यथाहुतमित्येतद् एवं दुःसम्पादितमसम्पादितम् अग्निहोत्राद्युपलक्षितं कर्म किं करोतीत्युच्यते ।

आसप्तमान्सप्तमसहितांस्तस्य कर्तुर्लोकान्हिनस्ति हिनस्तीव आयासमात्रफलत्वात्सम्यक् क्रियमाणेषु हि कर्मसु कर्मपरिणामानुरूपेण भूरादयः सत्यान्ताः सप्त लोकाः फलं प्राप्यन्ते । ते लोका एवं भूतेनाग्निहोत्रादिकर्मणा त्वप्राप्यत्वाद्ध्वंस्यन्त इव । आयासमात्रं त्वव्यभिचारीत्यतो हिनस्तीत्युच्यते ।

पिण्डदानाद्यनुग्रहेण वा सम्बध्यमानाः पितृपितामहप्रपितामहाः पुत्रपौत्रप्रपौत्राः स्वात्मोपकाराः सप्त लोका उक्तप्रकारेणाग्निहोत्रादिना न भवन्तीति हिंस्यन्त इत्युच्यते ॥ ३ ॥