एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् ।
तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥
तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५ ॥
eteṣu yaścarate bhrājamāneṣu yathākālaṃ cāhutayo hyādadāyan .
taṃ nayantyetāḥ sūryasya raśmayo yatra devānāṃ patireko’dhivāsaḥ .. 5 ..
जो पुरुष इन देदीप्यमान अग्निशिखाओं में यथासमय आहुतियाँ देता हुआ [अग्निहोत्रादि कर्म का] आचरण करता है उसे ये सूर्य की किरणें होकर वहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओं का एकमात्र स्वामी रहता है ॥ ५ ॥
जो अग्निहोत्री इन भ्राजमान-दीप्तिमान् अग्निजिह्वा के भेदों में यथाकाल यानी जिस कर्म का जो काल है उस काल का अतिक्रमण न करते हुए अग्निहोत्रादि कर्म का आचरण करता है, उस यजमान को इसकी दी हुई वे आहुतियाँ सूर्य की किरणें होकर अर्थात् सूर्य की किरणों द्वारा वहाँ पहुँचा देती हैं जहाँ-जिस स्वर्गलोक में देवताओं का एकमात्र पति इन्द्र सबके ऊपर अधिवास-अधिष्ठान करता है ॥ ५ ॥
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एतेष्वग्निजिह्वाभेदेषु योऽग्निहोत्री चरते कर्माचरत्यग्निहोत्रादि भ्राजमानेषु दीप्यमानेषु । यथाकालं च यस्य कर्मणो यः कालस्तत्कालं यथाकालं यजमानमाददायन्नाददाना आहुतयो यजमानेन निर्वर्तितास्तं नयन्ति प्रापयन्त्येता आहुतयो या इमा अनेन निर्वर्तिताः सूर्यस्य रश्मयो भूत्वा रश्मिद्वारैरित्यर्थः । यत्र यस्मिन्स्वर्गे देवानां पतिरिन्द्र एकः सर्वानुपरि अधि वसतीत्यधिवासः ॥ ५ ॥
वे सूर्य की किरणों द्वारा यजमान को किस प्रकार ले जाती हैं, सो बतलाया जाता है-
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कथं सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्तीत्युच्यते-