मुण्डक 1 खण्ड 2 - मन्त्र 6

एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति ।
प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६ ॥

ehyehīti tamāhutayaḥ suvarcasaḥ sūryasya raśmibhiryajamānaṃ vahanti .
priyāṃ vācamabhivadantyo’rcayantya eṣa vaḥ puṇyaḥ sukṛto brahmalokaḥ .. 6 ..


वे दीप्तिमती आहुतियाँ ‘आओ, आओ, यह तुम्हारे सुकृत से प्राप्त हुआ पवित्र ब्रह्मलोक है’ ऐसी प्रिय वाणी कहकर यजमान का अर्चन (सत्कार) करती हुई उसे ले जाती हैं ॥ ६ ॥
वे दीप्तिमती आहुतियाँ ‘आओ, आओ’ इस प्रकार पुकारती तथा प्रिय यानी स्तुति आदिरूप इष्टवाणी बोलकर उसका अर्चन-पूजन करती हुई अर्थात् ‘यह तुम्हारे सुकृत का फलस्वरूप पवित्र ब्रह्मलोक है’ इस प्रकार प्रिय वाणी कहती हुई उसे ले जाती हैं । यहाँ स्वर्ग ही को ब्रह्मलोक कहा है, क्योंकि प्रकरण से यही ठीक मालूम होता है ॥ ६ ॥
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एह्येहीत्याह्वयन्त्यः सुवर्चसो दीप्तिमत्यः किं च प्रियाम् इष्टां वाचं स्तुत्यादिलक्षणामभिवदन्त्य उच्चारयन्त्योऽर्चयन्त्यः पूजयन्त्यश्चैष वो युष्माकं पुण्यः सुकृतः पन्था ब्रह्मलोकः फलरूपः । एवं प्रियां वाचमभिवदन्त्यो वहन्तीत्यर्थः । ब्रह्मलोकः स्वर्गः प्रकरणात् ॥ ६ ॥

ज्ञानरहित कर्म की निन्दा

इस प्रकार यह ज्ञानरहित कर्म इतने ही फलवाला है । यह अविद्या काम और कर्म का कार्य है; इसलिये असार और दुःख की जड़ है, सो इसकी निन्दा की जाती है-
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एतच्च ज्ञानरहितं कर्मैतावत्फलमविद्याकामकर्म्मकार्यमतोऽसारं दुःखमूलमिति निन्द्यते-