एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७ ॥
plavā hyete adṛḍhā yajñarūpā aṣṭādaśoktamavaraṃ yeṣu karma .
etacchreyo ye’bhinandanti mūḍhā jarāmṛtyuṃ te punarevāpi yanti .. 7 ..
‘प्लव’ का अर्थ विनाशी है! क्योंकि सोलह ऋत्विक् तथा यजमान और पत्नी-ये अठारह यज्ञरूप-यज्ञ के रूप यानी यज्ञ के सम्पादक, जिनमें केवल ज्ञानरहित कर्म आश्रित है, अदृढ़-अस्थिर हैं और शास्त्रों में इन्हीं के आश्रित कर्म बतलाया है; अतः उस अवर कर्म के उन अठारह आश्रयों के अदृढ़तावश प्लव अर्थात् विनाशशील होने के कारण फल के सहित वह साध्य कर्म है, उनसे निष्पन्न होनेवाला कर्म, कूँडे के नाश से उसमें रखे हुए दूध और दही आदि के नाश के समान, नष्ट हो जाता है ।
क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये जो अविवेकी मूढ़ पुरुष ‘यह कर्म श्रेय यानी श्रेय का साधन है’ ऐसा मानकर अभिनन्दित-अत्यन्त हर्षित होते हैं वे इस (हर्ष) के द्वारा जरा और मृत्यु को प्राप्त होते हैं; अर्थात् कुछ समय स्वर्ग में रहकर फिर भी उसी जन्म-मरण को प्राप्त हो जाते हैं ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
प्लवा विनाशिन इत्यर्थः । हि यस्मादेतेऽदृढा अस्थिरा यज्ञरूपा यज्ञस्य रूपाणि यज्ञरूपा यज्ञनिर्वर्तका अष्टादशाष्टादशसंख्याकाः षोडशर्त्विजः पत्नी यजमानश्चेत्यष्टादश, एतदाश्रयं कर्मोक्तं कथितं शास्त्रेण, येष्वष्टादशस्ववरं केवलं ज्ञानवर्जितं कर्म; अतस्तेषामवरकर्माश्रयाणामष्टादशानामदृढतया प्लवत्वात्प्लवते सह फलेन तत्साध्यं कर्म; कुण्डविनाशादिवत्क्षीरदध्यादीनां तत्स्थानां नाशः ।
यत एवमेतत्कर्म श्रेयः श्रेयःकरणमिति येऽभिनन्दन्त्यभिहृष्यन्त्यविवेकिनो मूढा अतस्ते जरां च मृत्युं च जरामृत्युं किञ्चित्कालं स्वर्गे स्थित्वा पुनरेवापि यन्ति भूयोऽपि गच्छन्ति ॥ ७ ॥