मुण्डक 1 खण्ड 2 - मन्त्र 8

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः ।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८ ॥

avidyāyāmantare vartamānāḥ svayaṃ dhīrāḥ paṇḍitaṃ manyamānāḥ .
jaṅghanyamānāḥ pariyanti mūḍhā andhenaiva nīyamānā yathāndhāḥ .. 8 ..


अविद्या के मध्य में रहनेवाले और अपने को बड़ा बुद्धिमान् तथा पण्डित माननेवाले वे मूढ पुरुष अन्धे से ले जाये जाते हुए अन्धे के समान पीड़ित होते सब ओर भटकते रहते हैं ॥ ८ ॥
अविद्या के मध्य में रहनेवाले बहुधा अविवेकी किन्तु ‘हम ही बड़े बुद्धिमान् और पण्डित—ज्ञेय वस्तु को जाननेवाले हैं’ ऐसा मानकर अपने को सम्मानित करनेवाले वे मूढ़ पुरुष—जरा-रोग आदि अनेक अनर्थजाल से जंघन्यमान—हन्यमान अर्थात् अत्यन्त पीड़ित होते सब ओर घूमते—भटकते रहते हैं । जिस प्रकार लोक में दृष्टिहीन होने के कारण अन्धे अर्थात् नेत्रहीन से ले जाये जाते हुए— मार्ग प्रदर्शित किये जाते हुए अन्धे— नेत्रहीन पुरुष गड्ढे और काँटे आदि में गिरते रहते हैं उसी प्रकार [वे भी पीड़ा-पर-पीड़ा उठाते रहते हैं] ॥ ८ ॥
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अविद्यायामन्तरे मध्ये वर्तमाना अविवेकप्रायाः स्वयं वयमेव धीरा धीमन्तः पण्डिता विदितवेदितव्याश्चेति मन्यमाना आत्मानं सम्भावयन्तस्ते च जङ्घन्यमाना जरारोगाद्यनेकानर्थव्रातैः हन्यमाना भृशं पीड्यमानाः परियन्ति विभ्रमन्ति मूढाः । दर्शनवर्जितत्वादन्धेनैवाचक्षुष्केणैव नीयमानाः प्रदर्श्यमानमार्गा यथा लोकेऽन्धा अक्षिरहिता गर्तकण्टकादौ पतन्ति तद्वत् ॥ ८ ॥

तथा—
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किञ्च—