अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः ।
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥
यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९ ॥
avidyāyāṃ bahudhā vartamānā vayaṃ kṛtārthā ityabhimanyanti bālāḥ .
yatkarmiṇo na pravedayanti rāgāttenāturāḥ kṣīṇalokāścyavante .. 9 ..
बहुधा अविद्या में ही रहनेवाले वे मूर्खलोग ‘हम कृतार्थ हो गये हैं’ इस प्रकार अभिमान किया करते हैं । क्योंकि कर्मठलोगों को कर्मफलविषयक राग के कारण तत्त्व का ज्ञान नहीं होता, इसलिये वे दुःखार्त होकर (कर्मफल क्षीण होने पर) स्वर्ग से च्युत हो जाते हैं ॥ ९ ॥
अविद्या में बहुधा—अनेक प्रकार से विद्यमान वे अज्ञानी पुरुष ‘केवल हम ही कृतार्थ—कृतकृत्य हो गये हैं’ इसी प्रकार अभिमान किया करते हैं । क्योंकि इस प्रकार वे कर्मीलोग रागवश यानी कर्मफल-सम्बन्धी राग से बुद्धि के अभिभूत हो जाने के कारण तत्त्व को नहीं जान पाते इसलिये वे आतुर—दुःखार्त्त होकर कर्मफल क्षीण हो जाने पर स्वर्ग से च्युत हो जाते हैं ॥ ९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अविद्यायां बहुधा बहुप्रकारं वर्तमाना वयमेव कृतार्थाः कृतप्रयोजना इत्येवमभिमन्यन्त्यभिमानं कुर्वन्ति बाला अज्ञानिनः । यद्यस्मादेवं कर्मिणो न प्रवेदयन्ति तत्त्वं न जानन्ति रागात्कर्मफलरागाभिभवनिमित्तं तेन कारणेन आतुरा दुःखार्ताः सन्तः क्षीणलोकाः क्षीणकर्मफलाः स्वर्गलोकाच्च्यवन्ते ॥ ९ ॥