मुण्डक 2 खण्ड 1 - मन्त्र 1

तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः ।
तथाक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति ॥ १ ॥

tadetatsatyaṃ yathā sudīptātpāvakādvisphuliṅgāḥ sahasraśaḥ prabhavante sarūpāḥ .
tathākṣarādvividhāḥ somya bhāvāḥ prajāyante tatra caivāpi yanti .. 1 ..


वह यह (अक्षरब्रह्म) सत्य है । जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्नि से उसी के समान रूपवाले हजारों स्फुलिंग (चिनगारियाँ) निकलते हैं, हे सोम्य! उसी प्रकार उस अक्षर से अनेकों भाव प्रकट होते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं ॥ १ ॥

जो अपरा विद्या का विषय कर्मफलरूप सत्य है वह आपेक्षिक है; परन्तु यह परा विद्या का विषय परमार्थसत्स्वरूप होने के कारण [निरपेक्ष सत्य है] । वह यह विद्याविषयक सत्य ही यथार्थ सत्य है; इससे इतर तो अविद्या का विषय होने के कारण मिथ्या है । उस सत्य अक्षर को अत्यन्त परोक्ष होने के कारण किस प्रकार प्रत्यक्षवत् जानें? इसके लिये श्रुति ने यह दृष्टान्त दिया है—

जिस प्रकार सुदीप्त—अच्छी तरह दीप्त अर्थात् प्रज्वलित हुए अग्नि से उसी के-से रूपवाले सहस्रों— अनेकों विस्फुलिंग—अग्नि के अवयव निकलते हैं उसी प्रकार हे सोम्य! उक्त लक्षणवाले अक्षरब्रह्म से विविध—अनेक देहरूप उपाधिभेद के अनुसार विहित होने के कारण अनेक प्रकार के भाव—जीव उस नाना नाम-रूपकृत देहोपाधि के जन्म के साथ उसी प्रकार उत्पन्न हो जाते हैं जैसे घटादि उपाधिभेद के अनुसार आकाश से उन घटादि से परिच्छिन्न बहुत-से छिद्र (घटाकाशादि) । तथा जिस प्रकार घटादि के नष्ट होने पर वे [घटाकाशादि] छिद्र लीन हो जाते हैं उसी प्रकार देहरूप उपाधि के लीन होने पर वे सब उस अक्षर में ही लीन हो जाते हैं ।

जिस प्रकार छिद्रभेदों की उत्पत्ति और प्रलय में आकाश का निमित्तत्व घटादि उपाधि के ही कारण है उसी प्रकार जीवों की उत्पत्ति और प्रलय में नामरूपकृत देहोपाधि के कारण ही अक्षरब्रह्म का निमित्तत्व है ॥ १ ॥

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यदपरविद्याविषयं कर्मफललक्षणं सत्यं तदापेक्षिकम् । इदं तु परविद्याविषयं परमार्थसल्लक्षणत्वात् । तदेतत्सत्यं यथाभूतं विद्याविषयम्, अविद्याविषयत्वाच्चानृतमितरत् । अत्यन्तपरोक्षत्वात्कथं नाम प्रत्यक्षवत्सत्यमक्षरं प्रतिपद्येरन्निति दृष्टान्तमाह—

यथा सुदीप्तात्सुष्ठु दीप्ताद् इद्धात्पावकादग्नेर्विस्फुलिङ्गा अग्न्यवयवाः सहस्रशोऽनेकशः प्रभवन्ते निर्गच्छन्ति सरूपा अग्निसलक्षणा एव तथोक्तलक्षणाद् अक्षराद्विविधा नानादेहोपाधिभेदमनुविधीयमानत्वाद्विविधा हे सोम्य भावा जीवा आकाशादिव घटादिपरिच्छिन्नाः सुषिरभेदा घटाद्युपाधिप्रभेदमनुभवन्ति, एवं नानानामरूपकृतदेहोपाधिप्रभवमनुप्रजायन्ते तत्र चैव तस्मिन्नेवाक्षरेऽपि यन्ति देहोपाधिविलयमनुलीयन्ते घटादिविलयमन्विव सुषिरभेदाः ।

यथाकाशस्य सुषिरभेदोत्पत्तिप्रलयनिमित्तत्वं घटाद्युपाधिकृतमेव तद्वदक्षरस्यापि नामरूपकृतदेहोपाधिनिमित्तमेव जीवोत्पत्तिप्रलयनिमित्तत्वम् ॥ १ ॥


अपने विकारों की अपेक्षा महान् तथा नाम-रूप के बीजभूत अव्याकृतसंज्ञक अक्षर से भी उत्कृष्ट जो अक्षर परमात्मा का आकाश के समान सब प्रकार के आकारों से रहित ‘नेति-नेति’ इत्यादि वाक्यों से विशेषित एवं सम्पूर्ण औपाधिक भेदों से रहित स्वरूप है उसे बतलाने की इच्छा से श्रुति कहती है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
नामरूपबीजभूतादव्याकृताख्यात्स्वविकारापेक्षया परादक्षरात्परं यत्सर्वोपाधिभेदवर्जितमक्षरस्यैव स्वरूपमाकाशस्येव सर्वमूर्त्तिवर्जितं नेति नेतीत्यादिविशेषणं विवक्षन्नाह—