एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १० ॥
puruṣa evedaṃ viśvaṃ karma tapo brahma parāmṛtam .
etadyo veda nihitaṃ guhāyāṃ so’vidyāgranthiṃ vikiratīha somya .. 10 ..
पुरुष ही यह विश्व—सारा जगत् है; पुरुष से भिन्न ‘विश्व’ कोई वस्तु नहीं है । अतः ‘हे भगवन्! किसको जान लेने पर यह सब कुछ जान लिया जाता है? ’
ऐसा जो प्रश्न किया गया था उसीका यहाँ उत्तर दिया गया है कि ‘सबके कारणस्वरूप इस परमात्मा को जान लेने पर ही यह ज्ञान हो जाता है कि यह विश्व पुरुष ही है; उससे भिन्न नहीं है ।’
किन्तु यह विश्व है क्या? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं—अग्निहोत्रादिरूप कर्म, तप यानी ज्ञान, उसका फल तथा इसी प्रकार का यह और सब भी [विश्व कहलाता है] । यह सब ब्रह्म का ही कार्य है । इसलिये यह सब पर अमृत ब्रह्म है और परामृत ब्रह्म मैं ही हूँ—ऐसा जो पुरुष सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित उस ब्रह्म को जानता है । हे सोम्य—हे प्रियदर्शन! वह अपने ऐसे विज्ञान से अविद्याग्रन्थि को यानी ग्रन्थि (गाँठ) के समान दृढ़ हुई अविद्या की वासना को इस लोक में जीवित रहते ही काट डालता है—मरकर नहीं ॥ १० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
पुरुष एवेदं विश्वं सर्वम् । न विश्वं नाम पुरुषादन्यत्किञ्चिदस्ति । अतो यदुक्तं तदेवेदम् अभिहितं ‘कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति’ । एतस्मिन्हि परस्मिन्नात्मनि सर्वकारणे पुरुषे विज्ञाते पुरुष एवेदं विश्वं नान्यदस्तीति विज्ञातं भवतीति ।
किं पुनरिदं विश्वमित्युच्यते । कर्माग्निहोत्रादिलक्षणम् । तपो ज्ञानं तत्कृतं फलमन्यदेतावद्धीदं सर्वम् । तच्चैतद्ब्रह्मणः कार्यम् । तस्मात्सर्वं ब्रह्म परामृतं परममृतम् अहमेवेति यो वेद निहितं स्थितं गुहायां हृदि सर्वप्राणिनां स एवं विज्ञानादविद्याग्रन्थिं ग्रन्थिमिव दृढीभूतामविद्यावासनां विकिरति विक्षिपति नाशयतीह जीवन्नेव न मृतः सन् हे सोम्य प्रियदर्शन ॥ १० ॥
इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयमुण्डके
प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥