अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २ ॥
divyo hyamūrtaḥ puruṣaḥ sabāhyābhyantaro hyajaḥ .
aprāṇo hyamanāḥ śubhro hyakṣarātparataḥ paraḥ .. 2 ..
[वह अक्षरब्रह्म] स्वयंप्रकाश होने के कारण दिव्य—प्रकाशित होनेवाला है अथवा दिवि—अपने स्वरूप में ही स्थित या अलौकिक है; क्योंकि वह अमूर्त—सब प्रकार के आकार से रहित, पुरुष—पूर्ण अथवा शरीररूप पुर में शयन करनेवाला, सबाह्याभ्यन्तर—बाहर और भीतर के सहित सर्वत्र वर्तमान और अज—जो किसी से उत्पन्न न हो—ऐसा है; क्योंकि अपने से भिन्न कोई उसके जन्म का निमित्त है ही नहीं; जिस प्रकार कि जल से उत्पन्न होनेवाले बुद्बुदों का कारण वायु आदि है तथा घटाकाशादि भेदों का हेतु घट आदि पदार्थ हैं [उसी प्रकार उस अजन्मा के जन्म का कोई भी कारण नहीं है] । वस्तु के सारे विकारों का मूल जन्म ही है; अतः उस (जन्म) का प्रतिषेध कर दिये जाने पर वे सभी प्रतिषिद्ध हो जाते हैं; क्योंकि वह परमात्मा सबाह्याभ्यन्तर अज है, इसलिये वह अजर, अमर, अक्षर, ध्रुव और भयशून्य है—यह इसका तात्पर्य है ।
जिस प्रकार [दृष्टिदोष से] आकाश तल मलादियुक्त भासता है उसी प्रकार देहादि उपाधिभेद में दृष्टि रखनेवालों को यद्यपि विभिन्न देहों में [वह अक्षर ब्रह्म] प्राण, मन, इन्द्रिय एवं विषय से युक्तसा भासता है तो भी परमार्थ-स्वरूपदर्शियों को तो वह अप्राण—जिसमें क्रियाशक्ति भेदवाला चलनात्मक वायु न रहता हो तथा अमना—जिसमें ज्ञानशक्ति के अनेकों भेदवाला संकल्पादिरूप मन भी न हो, [इस प्रकार प्राण और मन से रहित ही भासता है ।] ‘अप्राणः’ और ‘अमनाः’ इन दोनों विशेषणों से प्राणादि वायुभेद, कर्मेन्द्रियाँ और उनके विषय तथा बुद्धि, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ और उनके विषय प्रतिषिद्ध हुए समझने चाहिये; जैसा कि एकदूसरी श्रुति उसे ‘मानो ध्यान करता हुआसा, मानो चेष्टा करता हुआसा’—ऐसा बतलाती है ।
इस प्रकार क्योंकि वह [प्राण और मन इन] दोनों उपाधियों से रहित है इसलिये वह शुभ्र—शुद्ध है । अतः नामरूप की बीजभूत उपाधि से जिसका स्वरूप लक्षित होता है उस अक्षर से—सम्पूर्ण कार्य-करण के बीजरूप से उपलक्षित होने के कारण उन उपाधियोंवाला अव्याकृतसंज्ञक वह अक्षर अपने सम्पूर्ण विकार से श्रेष्ठ है; उस सर्वोत्कृष्ट अक्षर से भी वह निरुपाधिक पुरुष उत्कृष्ट है—ऐसा इसका तात्पर्य है ।
किन्तु जिसमें सम्पूर्ण व्यवहार का विषयभूत वह आकाशसंज्ञक अक्षरतत्त्व ओतप्रोत है वह प्राणादि से रहित कैसे हो सकता है? ऐसी शंका होने पर कहते हैं—यदि प्राणादि अपनी उत्पत्ति से पूर्व भी पुरुष के समान स्वस्वरूप से विद्यमान रहते तो उन विद्यमान प्राणादि के कारण पुरुष का प्राणादियुक्त होना माना जा सकता था । किन्तु उस समय वे अपनी उत्पत्ति से पूर्व पुरुष के समान स्वरूपतः हैं नहीं, इसलिये जिस प्रकार पुत्र उत्पन्न न होने तक देवदत्त पुत्रहीन कहा जाता है उसी प्रकार परम पुरुष भी अप्राणादिमान् है ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
दिव्यो द्योतनवान्स्वयंज्योतिष्ट्वात् । दिवि वा स्वात्मनि भवोऽलौकिको वा । हि यस्मादमूर्तः सर्वमूर्तिवर्जितः पुरुषः पूर्णः पुरिशयो वा, दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरः सह बाह्याभ्यन्तरेण वर्तत इति अजो न जायते कुतश्चित्स्वतोऽन्यस्य जन्मनिमित्तस्य चाभावात्; यथा जलबुद्बुदादेर्वाय्वादि, यथा नभःसुषिरभेदानां घटादि । सर्वभावविकाराणां जनिमूलत्वात् तत्प्रतिषेधेन सर्वे प्रतिषिद्धा भवन्ति । सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजोऽतोऽजरोऽमृतोऽक्षरो ध्रुवोऽभय इत्यर्थः ।
यद्यपि देहाद्युपाधिभेददृष्टीनामविद्यावशाद् देहभेदेषु सप्राणः समनाः सेन्द्रियः सविषय इव प्रत्यवभासते तलमलादिमदिव आकाशं तथापि तु स्वतः परमार्थदृष्टीनामप्राणोऽविद्यमानः क्रियाशक्तिभेदवांश्चलनात्मको वायुर्यस्मिन्सावप्राणः । तथामना अनेकज्ञानशक्तिभेदवत्सङ्कल्पाद्यात्मकं मनोऽप्यविद्यमानं यस्मिन्सोऽयममनाः । अप्राणो ह्यमनाश्चेति प्राणादि वायुभेदाः कर्मेन्द्रियाणि तद्विषयाश्च तथा च बुद्धिमनसी बुद्धीन्द्रियाणि तद्विषयाश्च प्रतिषिद्धा वेदितव्याः । तथा श्रुत्यन्तरे—“ध्यायतीव लेलायतीव” (बृ० उ० ४ ।३ ।७) इति ।
यस्माच्चैवं प्रतिषिद्धोपाधिद्वयः तस्माच्छुभ्रः शुद्धः । अतोऽक्षरान्नामरूपबीजोपाधिलक्षितस्वरूपात्सर्वकार्यकरणबीजत्वेनोपलक्ष्यमाणत्वात्परं तदुपाधिलक्षणमव्याकृताख्यमक्षरं सर्वविकारेभ्यः तस्मात्परतोऽक्षरात्परो निरुपाधिकः पुरुष इत्यर्थः ।
यस्मिंस्तदाकाशाख्यमक्षरं संव्यवहारविषयमोतं प्रोतं च कथं पुनरप्राणादिमत्त्वं तस्येत्युच्यते । यदि हि प्राणादयः प्रागुत्पत्तेः पुरुष इव स्वेनात्मना सन्ति तदा पुरुषस्य प्राणादिना विद्यमानेन प्राणादिमत्त्वं भवेन्न तु ते प्राणादयः प्रागुत्पत्तेः पुरुष इव स्वेनात्मना सन्ति तदा, अतोऽप्राणादिमान्परः पुरुषः, यथानुत्पन्ने पुत्रेऽपुत्रो देवदत्तः ॥ २ ॥