मुण्डक 2 खण्ड 1 - मन्त्र 3

एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥

etasmājjāyate prāṇo manaḥ sarvendriyāṇi ca .
khaṃ vāyurjyotirāpaḥ pṛthivī viśvasya dhāriṇī .. 3 ..


इस (अक्षर पुरुष) से ही प्राण उत्पन्न होता है तथा इससे ही मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सारे संसार को धारण करनेवाली पृथ्वी [उत्पन्न होती है] ॥ ३ ॥

नाम-रूप की बीजभूत [अविद्यारूप] उपाधि से उपलक्षित इस पुरुष से ही अविद्या का विषय विकारभूत केवल नाममात्र तथा मिथ्या प्राण उत्पन्न होता है; जैसा कि “विकार वाणी का विलास और नाममात्र है” “वह मिथ्या है” ऐसी अन्य श्रुति से सिद्ध होता है । उस अविद्याविषयक मिथ्या प्राण से परब्रह्म का सप्राणत्व सिद्ध नहीं हो सकता, जैसे कि स्वप्न में देखे हुए पुत्र से पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् नहीं हो सकता ।

इस प्रकार मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और उनके विषय भी इसी से उत्पन्न होते हैं । अतः उसका मुख्यरूप से अप्राणादिमान् होना सिद्ध हुआ । वे जिस प्रकार अपनी उत्पत्ति से पूर्व वस्तुतः असत् ही थे उसी प्रकार लीन होने पर भी असत् ही रहते हैं—ऐसा समझना चाहिये । जिस प्रकार करण—मन और इन्द्रियाँ [इससे उत्पन्न होते हैं] उसी प्रकार शरीर और इन्द्रियों के विषयों के कारणस्वरूप भूतवर्ग आकाश, आवहादि भेदोंवाला बाह्य वायु, अग्नि, जल और विश्व यानी सबको धारण करनेवाली पृथिवी—ये पाँच भूत, जो पूर्व-पूर्व गुण के सहित उत्तरोत्तर क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन गुणों से युक्त हैं, उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥

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एतस्मादेव पुरुषान्नामरूपबीजोपाधिलक्षिताज्जायत उत्पद्यतेऽविद्याविषयविकारभूतो नामधेयोऽनृतात्मकः प्राणः “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६ ।१ ।४) “अनृतम्” इति श्रुत्यन्तरात् । न हि तेनाविद्याविषयेणानृतेन प्राणेन सप्राणत्वं परस्य स्यादपुत्रस्य स्वप्नदृष्टेनेव पुत्रेण सपुत्रत्वम् ।

एवं मनः सर्वाणि चेन्द्रियाणि विषयाश्चैतस्मादेव जायन्ते तस्मात्सिद्धमस्य निरुपचरितमप्राणादिमत्त्वमित्यर्थः । यथा च प्रागुत्पत्तेः परमार्थतोऽसन्तस्तथा प्रलीनाश्चेति द्रष्टव्याः । यथा करणानि मनश्चेन्द्रियाणि तथा शरीरविषयकारणानि भूतानि खमाकाशं वायुरन्तर्बाह्य आवहादिभेदः, ज्योतिरग्निः, आप उदकम्, पृथिवी धरित्री विश्वस्य सर्वस्य धारिणी एतानि च शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोत्तरोत्तर गुणानि पूर्वपूर्वगुणसहितान्येतस्मादेव जायन्ते ॥ ३ ॥


परविद्या के विषयभूत निर्विशेष सत्य पुरुष का ‘दिव्यो ह्यमूर्तः’ इत्यादि मन्त्र से संक्षेपतः वर्णन कर अब उसी तत्त्व का सविशेषरूप से विस्तारपूर्वक वर्णन करना है—इसी के लिये यह श्रुति प्रवृत्त होती है; क्योंकि सूत्र और उसके भाष्य के समान [पहले] संक्षेप में और [फिर] विस्तारपूर्वक कहा हुआ पदार्थ सुगमता से समझ में आ जाता है । जो ब्रह्माण्डान्तर्वर्ती विराट् प्रथम उत्पन्न हुए प्राण यानी हिरण्यगर्भ से उत्पन्न होता है वह अन्य तत्त्वरूप से लक्षित कराया जाने पर भी इस पुरुष से ही उत्पन्न होता है और पुरुषरूप ही है—यही बात यह मन्त्र बतलाता है और उसके विशेषणों का उल्लेख करता है—
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संक्षेपतः परविद्याविषयमक्षरं निर्विशेषं पुरुषं सत्यं दिव्यो ह्यमूर्त इत्यादिना मन्त्रेणोक्त्वा पुनस्तदेव सविशेषं विस्तरेण वक्तव्यमिति प्रववृते; संक्षेपविस्तरोक्तो हि पदार्थः सुखाधिगम्यो भवति सूत्रभाष्योक्तिवदिति । योऽपि प्रथमजात्प्राणाद्धिरण्यगर्भाज्जायतेऽण्डस्यान्तर्विराट् स तत्त्वान्तरितत्वेन लक्ष्यमाणोऽप्येतस्मादेव पुरुषाज्जायत एतन्मयश्चेत्येतदर्थमाह । तं च विशिनष्टि—