खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३ ॥
etasmājjāyate prāṇo manaḥ sarvendriyāṇi ca .
khaṃ vāyurjyotirāpaḥ pṛthivī viśvasya dhāriṇī .. 3 ..
नाम-रूप की बीजभूत [अविद्यारूप] उपाधि से उपलक्षित इस पुरुष से ही अविद्या का विषय विकारभूत केवल नाममात्र तथा मिथ्या प्राण उत्पन्न होता है; जैसा कि “विकार वाणी का विलास और नाममात्र है” “वह मिथ्या है” ऐसी अन्य श्रुति से सिद्ध होता है । उस अविद्याविषयक मिथ्या प्राण से परब्रह्म का सप्राणत्व सिद्ध नहीं हो सकता, जैसे कि स्वप्न में देखे हुए पुत्र से पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् नहीं हो सकता ।
इस प्रकार मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और उनके विषय भी इसी से उत्पन्न होते हैं । अतः उसका मुख्यरूप से अप्राणादिमान् होना सिद्ध हुआ । वे जिस प्रकार अपनी उत्पत्ति से पूर्व वस्तुतः असत् ही थे उसी प्रकार लीन होने पर भी असत् ही रहते हैं—ऐसा समझना चाहिये । जिस प्रकार करण—मन और इन्द्रियाँ [इससे उत्पन्न होते हैं] उसी प्रकार शरीर और इन्द्रियों के विषयों के कारणस्वरूप भूतवर्ग आकाश, आवहादि भेदोंवाला बाह्य वायु, अग्नि, जल और विश्व यानी सबको धारण करनेवाली पृथिवी—ये पाँच भूत, जो पूर्व-पूर्व गुण के सहित उत्तरोत्तर क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन गुणों से युक्त हैं, उत्पन्न होते हैं ॥ ३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
एतस्मादेव पुरुषान्नामरूपबीजोपाधिलक्षिताज्जायत उत्पद्यतेऽविद्याविषयविकारभूतो नामधेयोऽनृतात्मकः प्राणः “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्” (छा० उ० ६ ।१ ।४) “अनृतम्” इति श्रुत्यन्तरात् । न हि तेनाविद्याविषयेणानृतेन प्राणेन सप्राणत्वं परस्य स्यादपुत्रस्य स्वप्नदृष्टेनेव पुत्रेण सपुत्रत्वम् ।
एवं मनः सर्वाणि चेन्द्रियाणि विषयाश्चैतस्मादेव जायन्ते तस्मात्सिद्धमस्य निरुपचरितमप्राणादिमत्त्वमित्यर्थः । यथा च प्रागुत्पत्तेः परमार्थतोऽसन्तस्तथा प्रलीनाश्चेति द्रष्टव्याः । यथा करणानि मनश्चेन्द्रियाणि तथा शरीरविषयकारणानि भूतानि खमाकाशं वायुरन्तर्बाह्य आवहादिभेदः, ज्योतिरग्निः, आप उदकम्, पृथिवी धरित्री विश्वस्य सर्वस्य धारिणी एतानि च शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोत्तरोत्तर गुणानि पूर्वपूर्वगुणसहितान्येतस्मादेव जायन्ते ॥ ३ ॥