तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् ।
पुमान्रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥
पुमान्रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्सम्प्रसूताः ॥ ५ ॥
tasmādagniḥ samidho yasya sūryaḥ somātparjanya oṣadhayaḥ pṛthivyām .
pumānretaḥ siñcati yoṣitāyāṃ bahvīḥ prajāḥ puruṣātsamprasūtāḥ .. 5 ..
उस पुरुष से ही, सूर्य जिसका समिधा है वह अग्नि उत्पन्न हुआ है । [उस द्युलोकरूप अग्नि से निष्पन्न हुए] सोम से मेघ और [मेघ से] पृथिवीतल में ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पुरुष स्त्री में [ओषधियों से उत्पन्न हुआ] वीर्य सींचता है; इस प्रकार पुरुष से ही यह बहुत-सी प्रजा उत्पन्न हुई है ॥ ५ ॥
उस परम पुरुष से प्रजा का अवस्थानविशेषरूप अग्नि उत्पन्न हुआ । उसकी विशेषता बतलाते हैं—सूर्य जिसका समिधा (इन्धन) है— [अग्निहोत्र के] समिधा के समान ही समिधा है, क्योंकि सूर्य से ही द्युलोक समिद्ध (प्रदीप्त) होता है । उस द्युलोकरूप अग्नि से निष्पन्न हुए सोम से [पंचाग्नियों में] दूसरा अग्नि मेघ उत्पन्न होता है । फिर उस मेघ से पृथिवीतल में ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं । पुरुषरूप अग्नि में हवन की हुई वीर्य की कारणरूप ओषधियों से [वीर्य होता है] । उस वीर्य को पुरुषरूप अग्नि योषित्—योषिद्रूप अग्नि यानी स्त्री में सींचता है । इस क्रम से यह ब्राह्मणादिरूप बहुत-सी प्रजा परम पुरुष से ही उत्पन्न हुई है ॥ ५ ॥
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तस्मात्परस्मात्पुरुषात्प्रजावस्थानविशेषरूपोऽग्निः । स विशिष्यते; समिधो यस्य सूर्यः समिध इव समिधः । सूर्येण हि द्युलोकः समिध्यते । ततो हि द्युलोकान्निष्पन्नात् सोमात्पर्जन्यो द्वितीयोऽग्निः सम्भवति । तस्माच्च पर्जन्याद् ओषधयः पृथिव्यां सम्भवन्ति । ओषधिभ्यः पुरुषाग्नौ हुताभ्य उपादानभूताभ्यः । पुमानग्नौ रेतः सिञ्चति योषितायां योषिति योषाग्नौ स्त्रियामिति । एवं क्रमेण बह्वीर्बह्व्यः प्रजा ब्राह्मणाद्याः पुरुषात्परस्मात्सम्प्रसूताः समुत्पन्नाः ॥ ५ ॥
कर्म और उनके साधन भी पुरुषप्रसूत ही हैं
यही नहीं, कर्म के साधन और फल भी उसी से उत्पन्न हुए हैं, ऐसा श्रुति कहती है—सो किस प्रकार?
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किं च कर्मसाधनानि फलानि च तस्मादेवेत्याह; कथम्?