मुण्डक 2 खण्ड 1 - मन्त्र 6

तस्मादृचः साम यजूंषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च ।
संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥

tasmādṛcaḥ sāma yajūṃṣi dīkṣā yajñāśca sarve kratavo dakṣiṇāśca .
saṃvatsaraśca yajamānaśca lokāḥ somo yatra pavate yatra sūryaḥ .. 6 ..


उस पुरुष से ही ऋचाएँ, साम, यजुः, दीक्षा, सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु, दक्षिणा, संवत्सर, यजमान, लोक और जहाँ तक चन्द्रमा पवित्र करता है तथा सूर्य तपता है वे लोक उत्पन्न हुए हैं ॥ ६ ॥

उस पुरुष से ही ऋचाएँ—जिनके पाद नियत अक्षरों में समाप्त होनेवाले हैं वे गायत्री आदि छन्दोंवाले मन्त्र, साम—पांचभक्तिक अथवा साप्तभक्तिक स्तोभादि [ * ] गानविशिष्ट मन्त्र तथा यजुः—जिनके पादों का अन्त नियमित अक्षरों में नहीं होता ऐसे वाक्यरूप मन्त्र—इस प्रकार ये तीनों प्रकार के मन्त्र [उत्पन्न हुए हैं तथा उसी से] दीक्षा—मौंजीबन्धन आदि यज्ञकर्ता के नियमविशेष, अग्निहोत्रादि सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु—यूपसहित यज्ञ, दक्षिणा—एक गौ से लेकर अपने अपरिमित सर्वस्वदानपर्यन्त, संवत्सर—कर्म का अंगभूत काल, यजमान—यज्ञकर्ता तथा उसके कर्म के फलस्वरूप लोक उत्पन्न हुए हैं । उन लोकों की विशेषताएँ बतलाते हैं—जिन लोकों में चन्द्रमा लोकों को पवित्र करता है और जिनमें सूर्य तपता रहता है वे विद्वान् और अविद्वान् कर्ता के कर्मफलभूत दक्षिणायनउत्तरायण इन दो मार्ग से प्राप्त होनेवाले लोक उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥

[ * ]: जिस मन्त्र में हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन—ये पाँच अवयव रहते हैं उसे ‘पांचभक्तिक’ और जिसमें उपद्रव तथा स्तोभ आदि—ये दो अवयव और होते हैं उसे ‘साप्तभक्तिक’ कहते हैं । ‘हुं फट्’ आदि अर्थशून्य वर्णों का नाम ‘स्तोभ’ है ।

तात्पर्य पढ़ें
तस्मात्पुरुषादृचो नियताक्षरपादावसाना गायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टा मन्त्राः । साम पाञ्चभक्तिकं च साप्तभक्तिकं च स्तोभादिगीतविशिष्टम् । यजूंषि अनियताक्षरपादावसानानि वाक्यरूपाण्येवं त्रिविधा मन्त्राः । दीक्षा मौञ्ज्यादिलक्षणा कर्तृनियमविशेषाः । यज्ञाश्च सर्वेऽग्निहोत्रादयः । क्रतवः सयूपाः दक्षिणाश्चैकगवाद्य परिमितसर्वस्वान्ताः । संवत्सरश्च कालः कर्माङ्गः । यजमानश्च कर्ता । लोकास्तस्य कर्मफलभूतास्ते विशिष्यन्ते; सोमो यत्र येषु लोकेषु पवते पुनाति लोकान्यत्र येषु सूर्यस्तपति च ते च दक्षिणायनोत्तरायणमार्गद्वयगम्या विद्वदविद्वत्कर्तृफलभूताः ॥ ६ ॥