संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६ ॥
tasmādṛcaḥ sāma yajūṃṣi dīkṣā yajñāśca sarve kratavo dakṣiṇāśca .
saṃvatsaraśca yajamānaśca lokāḥ somo yatra pavate yatra sūryaḥ .. 6 ..
उस पुरुष से ही ऋचाएँ—जिनके पाद नियत अक्षरों में समाप्त होनेवाले हैं वे गायत्री आदि छन्दोंवाले मन्त्र, साम—पांचभक्तिक अथवा साप्तभक्तिक स्तोभादि [ * ] गानविशिष्ट मन्त्र तथा यजुः—जिनके पादों का अन्त नियमित अक्षरों में नहीं होता ऐसे वाक्यरूप मन्त्र—इस प्रकार ये तीनों प्रकार के मन्त्र [उत्पन्न हुए हैं तथा उसी से] दीक्षा—मौंजीबन्धन आदि यज्ञकर्ता के नियमविशेष, अग्निहोत्रादि सम्पूर्ण यज्ञ, क्रतु—यूपसहित यज्ञ, दक्षिणा—एक गौ से लेकर अपने अपरिमित सर्वस्वदानपर्यन्त, संवत्सर—कर्म का अंगभूत काल, यजमान—यज्ञकर्ता तथा उसके कर्म के फलस्वरूप लोक उत्पन्न हुए हैं । उन लोकों की विशेषताएँ बतलाते हैं—जिन लोकों में चन्द्रमा लोकों को पवित्र करता है और जिनमें सूर्य तपता रहता है वे विद्वान् और अविद्वान् कर्ता के कर्मफलभूत दक्षिणायनउत्तरायण इन दो मार्ग से प्राप्त होनेवाले लोक उत्पन्न होते हैं ॥ ६ ॥
[ * ]: जिस मन्त्र में हिंकार, प्रस्ताव, उद्गीथ, प्रतिहार और निधन—ये पाँच अवयव रहते हैं उसे ‘पांचभक्तिक’ और जिसमें उपद्रव तथा स्तोभ आदि—ये दो अवयव और होते हैं उसे ‘साप्तभक्तिक’ कहते हैं । ‘हुं फट्’ आदि अर्थशून्य वर्णों का नाम ‘स्तोभ’ है ।