मुण्डक 2 खण्ड 1 - मन्त्र 7

तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।
प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७ ॥

tasmācca devā bahudhā samprasūtāḥ sādhyā manuṣyāḥ paśavo vayāṃsi .
prāṇāpānau vrīhiyavau tapaśca śraddhā satyaṃ brahmacaryaṃ vidhiśca .. 7 ..


उससे ही [कर्म के अंगभूत] बहुत-से देवता उत्पन्न हुए तथा साध्यगण, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, व्रीहि, यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि [ये सब भी उसी से उत्पन्न हुए हैं] ॥ ७ ॥
उस पुरुष से ही वसु आदि गण के भेद से कर्म के अंगभूत बहुत-से देवता उत्पन्न हुए हैं तथा साध्यगण देवताओं की जाति-विशेष, कर्म के अधिकारी मनुष्य, गाँव और जंगल में रहनेवाले पशु, वयस्—पक्षी, मनुष्य के जीवनरूप प्राण-अपान (श्वासोच्छ्वास) हवि के लिये व्रीहि और यव, पुरुष का संस्कार करनेवाला तथा स्वतन्त्रता से फल देनेवाला कर्म का अंगभूत तप, श्रद्धा—जिसके कारण सम्पूर्ण पुरुषार्थसाधनों का प्रयोग, चित्त-प्रसाद और आस्तिक्यबुद्धि होती है तथा सत्य—मिथ्या का त्याग एवं यथार्थ और किसी को पीड़ा न देनेवाला वचन, ब्रह्मचर्य—मैथुन न करना और ऐसा करना चाहिये—इस प्रकार की विधि [ये सब भी उस पुरुष से ही उत्पन्न हुए हैं] ॥ ७ ॥
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तस्माच्च पुरुषात्कर्माङ्गभूता देवा बहुधा वस्वादिगणभेदेन सम्प्रसूताः सम्यक्प्रसूताः । साध्या देवविशेषाः । मनुष्याः कर्माधिकृताः । पशवो ग्राम्यारण्याः । वयांसि पक्षिणः । जीवनं च मनुष्यादीनां प्राणापानौ व्रीहियवौ हविरर्थौ । तपश्च कर्माङ्गं पुरुषसंस्कारलक्षणं स्वतन्त्रं च फलसाधनम् ।

श्रद्धा यत्पूर्वकः सर्वपुरुषार्थसाधनप्रयोगश्चित्तप्रसाद आस्तिक्यबुद्धिस्तथा सत्यमनृतवर्जनं यथाभूतार्थवचनं चापीडाकरम् । ब्रह्मचर्यं मैथुनासमाचारः । विधिश्चेतिकर्तव्यता ॥ ७ ॥


इन्द्रिय, विषय और इन्द्रिय-स्थानादि भी ब्रह्मजनित ही हैं

तथा—
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किं च—