मुण्डक 2 खण्ड 1 - मन्त्र 8

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः ।
सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८ ॥

sapta prāṇāḥ prabhavanti tasmāt saptārciṣaḥ samidhaḥ sapta homāḥ .
sapta ime lokā yeṣu caranti prāṇā guhāśayā nihitāḥ sapta sapta .. 8 ..


उस पुरुष से ही सात प्राण (मस्तकस्थ सात इन्द्रियाँ) उत्पन्न हुए हैं । उसी से उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिधा (विषय), सात होम (विषयज्ञान) और जिनमें वे संचार करते हैं वे सात स्थान प्रकट हुए हैं । [इस प्रकार] प्रति देह में स्थापित ये सात-सात पदार्थ [उस पुरुष से ही हुए हैं] ॥ ८ ॥

[दो नेत्र, दो श्रवण, दो घ्राण और एक रसना—ये] सात मस्तकस्थ प्राण उसी पुरुष से उत्पन्न होते हैं । तथा अपने-अपने विषयों को प्रकाशित करनेवाली उनकी सात दीप्तियाँ, सात समिध—उनके सात विषय, क्योंकि प्राण (इन्द्रियवर्ग) अपने विषयों से ही समिद्ध (प्रदीप्त) हुआ करते हैं । सात होम अर्थात् अपने विषयों के विज्ञान, जैसा कि “इसका जो विज्ञान है उसीको हवन करता है” इस अन्य श्रुति से सिद्ध होता है, [ये सब इस पुरुष से ही प्रकट हुए हैं] ।

तथा ये सात लोक—इन्द्रिय-स्थान, जिनमें कि ये प्राण संचार करते हैं । ‘जिनमें प्राण संचार करते हैं’ यह प्राणों का विशेषण [उनके प्रसिद्ध अर्थ] प्राणापानादि की आशंका निवृत्त करने के लिये है । जो सुषुप्ति-अवस्था में गुहा—शरीर अथवा हृदय में शयन करते हैं वे गुहाशय तथा विधाता द्वारा प्रत्येक प्राणी में निहित—स्थापित ये सात-सात पदार्थ [इस पुरुष से ही उत्पन्न हुए हैं] ।

इस प्रकार जो भी आत्मयाजी विद्वानों के कर्म और कर्मफल तथा अज्ञानियों के कर्म, कर्मफल और उनके साधन हैं वे सब उस परम पुरुष से ही उत्पन्न हुए हैं—यह इस प्रकरण का अर्थ है ॥ ८ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

सप्त शीर्षण्याः प्राणास्तस्मादेव पुरुषात्प्रभवन्ति । तेषां च सप्तार्चिषो दीप्तयः स्वविषयावद्योतनानि । तथा सप्त समिधः सप्त विषयाः, विषयैर्हि समिध्यन्ते प्राणाः । सप्त होमास्तद्विषयविज्ञानानि “यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति” (महानारा० २५ ।१) इति श्रुत्यन्तरात् ।

किं च सप्तमे लोका इन्द्रियस्थानानि येषु चरन्ति सञ्चरन्ति प्राणाः । प्राणा येषु चरन्तीति प्राणानां विशेषणमिदं प्राणापानादिनिवृत्त्यर्थम् । गुहायां शरीरे हृदये वा स्वापकाले शेरत इति गुहाशयाः, निहिताः स्थापिता धात्रा सप्त सप्त प्रतिप्राणिभेदम् ।

यानि चात्मयाजिनां विदुषां कर्माणि कर्मफलानि चाविदुषां च कर्माणि तत्साधनानि कर्मफलानि च सर्वं चैतत्परस्मादेव पुरुषात्सर्वज्ञात्प्रसूतमिति प्रकरणार्थः ॥ ८ ॥