अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः ।
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥
अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥
ataḥ samudrā girayaśca sarve’smātsyandante sindhavaḥ sarvarūpāḥ .
ataśca sarvā oṣadhayo rasaśca yenaiṣa bhūtaistiṣṭhate hyantarātmā .. 9 ..
इसीसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं; इसीसे अनेक रूपोंवाली नदियाँ बहती हैं; इसीसे सम्पूर्ण ओषधियाँ और रस प्रकट हुए हैं, जिस (रस)-से भूतों से परिवेष्टित हुआ यह अन्तरात्मा स्थित होता है ॥ ९ ॥
इस पुरुष से ही क्षारादि सात समुद्र और इसीसे हिमालय आदि समस्त पर्वत उत्पन्न हुए हैं । गंगा आदि अनेक रूपोंवाली नदियाँ भी इसीसे प्रवाहित होती हैं । इसी पुरुष से व्रीहि, यव आदि सम्पूर्ण ओषधियाँ तथा मधुरादि छः प्रकार का रस उत्पन्न हुआ है, जिस रस से कि पाँच स्थूल भूतों द्वारा परिवेष्टित हुआ अन्तरात्मा—लिंगदेह यानी सूक्ष्म शरीर स्थित रहता है । यह शरीर और आत्मा के मध्य में आत्मा के समान स्थित है, इसलिये अन्तरात्मा कहलाता है ॥ ९ ॥
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अतः पुरुषात्समुद्राः सर्वे क्षाराद्याः गिरयश्च हिमवदादयोऽस्मादेव पुरुषात्सर्वे । स्यन्दन्ते स्रवन्ति गङ्गाद्याः सिन्धवो नद्यः सर्वरूपा बहुरूपा अस्मादेव पुरुषात् सर्वा ओषधयो व्रीहियवाद्याः । रसश्च मधुरादिः षड्विधो येन रसेन भूतैः पञ्चभिः स्थूलैः परिवेष्टितस्तिष्ठते तिष्ठति ह्यन्तरात्मा लिङ्गं सूक्ष्म शरीरम् । तद्ध्यन्तराले शरीरस्यात्मनश्चात्मवद्वर्त्तत इत्यन्तरात्मा ॥ ९ ॥
ब्रह्म और जगत् का अभेद तथा ब्रह्मज्ञान से अविद्याग्रन्थि का नाश
इस प्रकार यह सब पुरुष से ही उत्पन्न हुआ है; अतः विकार वाणी का आरम्भ और नाममात्र के लिये तथा मिथ्या ही है, केवल पुरुष ही सत्य है । इसलिये—
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एवं पुरुषात्सर्वमिदं सम्प्रसूतम् । अतो वाचारम्भणं विकारो नामधेयमनृतं पुरुष इत्येव सत्यम् । अतः—