एजत्प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ १ ॥
āviḥ saṃnihitaṃ guhācaraṃ nāma mahatpadamatraitatsamarpitam .
ejatprāṇannimiṣacca yadetajjānatha sadasadvareṇyaṃ paraṃ vijñānādyadvariṣṭhaṃ prajānām .. 1 ..
आविः—प्रकाशस्वरूप, संनिहित—समीपस्थित; वागादि उपाधियों द्वारा प्रज्वलित होता है, प्रकाशित होता है—ऐसी एक अन्य श्रुति के अनुसार वह शब्दादि विषयों को उपलब्ध करता-सा जान पड़ता है अर्थात् सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान आदि उपाधि के धर्मों से आविर्भूत हुआ दिखायी देता है [अतः संनिहित है] । इस प्रकार जो प्रकाशमान ब्रह्म हृदय में संनिहित—सम्यक् स्थित है वह गुहाचर—दर्शन-श्रवणादि प्रकारों से गुहा (बुद्धि) में संचार करता है इसलिये गुहाचर नाम से विख्यात है ।
[वही महत्पद है] सबसे बड़ा होने के कारण वह ‘महत्’ है और सबसे प्राप्त किया जाता है अथवा सारे पदार्थों का आश्रय है, इसलिये ‘पद’ है ।
वह ‘महत्पद’ किस प्रकार है? सो बतलाते हैं—क्योंकि इस ब्रह्म में ही, रथ की नाभि में अरों के समान यह सब कुछ समर्पित अर्थात् भली प्रकार प्रवेशित है । एजत्—चलने-फिरनेवाले पक्षी आदि, प्राणत्—जो प्राणन करते हैं वे प्राणापानादिमान् मनुष्य और पशु आदि, निमिषत् च—जो निमेषादि क्रियावाले और च शब्द के सामर्थ्य से जो निमेष नहीं करनेवाले हैं वे भी इस प्रकार ये सब इस ब्रह्म में ही समर्पित हैं ।
हे शिष्यगण! ये सब जिस [ब्रह्मरूप] आश्रयवाले हैं उसे तुम जानो—समझो; वह सदसत्स्वरूप तुम्हारा आत्मा है, क्योंकि उससे भिन्न कोई सत् या असत्—मूर्त या अमूर्त अर्थात् स्थूल या सूक्ष्म है ही नहीं । और वही नित्य होने के कारण सबका वरेण्य—वरणीय—प्रार्थनीय है तथा प्रजाओं के विज्ञान से परे यानी व्यतिरिक्त है—इस प्रकार इस [पर शब्द] का व्यवधानयुक्त [प्रजानाम्] पद से सम्बन्ध है । तात्पर्य यह कि जो लौकिक विज्ञान का अविषय है और वरिष्ठ यानी सम्पूर्ण श्रेष्ठ पदार्थों में श्रेष्ठतम है, क्योंकि सम्पूर्ण दोषों से रहित होने के कारण एक वह ब्रह्म ही अत्यन्त श्रेष्ठ है ॥ १ ॥
तात्पर्य पढ़ें
आविः प्रकाशं संनिहितं वागाद्युपाधिभिर्ज्वलति भ्राजतीति श्रुत्यन्तराच्छब्दादीनुपलभमानवदवभासते । दर्शनश्रवणमननविज्ञानाद्युपाधिधर्मैराविर्भूतं सल्लक्ष्यते हृदि सर्वप्राणिनाम् । यदेतदाविर्ब्रह्म संनिहितं सम्यक् स्थितं हृदि तद्गुहाचरं नाम । गुहायां चरतीति दर्शनश्रवणादिप्रकारैर्गुहाचरमिति प्रख्यातम् ।
महत्सर्वमहत्त्वात् । पदं पद्यते सर्वेणेति सर्वपदार्थास्पदत्वात् ।
कथं तन्महत्पदमित्युच्यते । यतोऽत्रास्मिन्ब्रह्मण्येतत्सर्वं समर्पितं प्रवेशितं रथनाभाविवाराः । एजच्चलत्पक्ष्यादि, प्राणत्प्राणितीति प्राणापानादिमन्मनुष्यपश्वादि, निमिषच्च यन्निमेषादिक्रियावद्यच्चानिमिषच्चशब्दात्समस्तमेतदत्रैव ब्रह्मणि समर्पितम् ।
एतद्यदास्पदं सर्वं जानथ हे शिष्या अवगच्छथ तदात्मभूतं भवतां सदसत्स्वरूपम् । सदसतोर्मूर्तामूर्तयोः स्थूलसूक्ष्मयोस्तद्व्यतिरेकेणाभावात् । वरेण्यं वरणीयं तदेव हि सर्वस्य नित्यत्वात्प्रार्थनीयम् । परं व्यतिरिक्तं विज्ञानात्प्रजानामिति व्यवहितेन सम्बन्धः यल्लौकिकविज्ञानागोचरमित्यर्थः । यद्वरिष्ठं वरतमं सर्वपदार्थेषु वरेषु तद्ध्येकं ब्रह्मातिशयेन वरं सर्वदोषरहितत्वात् ॥ १ ॥