मुण्डक 2 खण्ड 2 - मन्त्र 2

यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च ।
तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः ।
तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २ ॥

yadarcimadyadaṇubhyo’ṇu ca yasmi~llokā nihitā lokinaśca .
tadetadakṣaraṃ brahma sa prāṇastadu vāṅmanaḥ .
tadetatsatyaṃ tadamṛtaṃ tadveddhavyaṃ somya viddhi .. 2 ..


जो दीप्तिमान् और अणु से भी अणु है तथा जिसमें सम्पूर्ण लोक और उनके निवासी स्थित हैं वही यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है तथा वही वाक् और मन है । वही यह सत्य और अमृत है । हे सोम्य! उसका [मनोनिवेश द्वारा] वेधन करना चाहिये; तू उसका वेधन कर ॥ २ ॥

जो अर्चिमत् यानी दीप्तिमान् है; ब्रह्म की दीप्ति से ही सूर्य आदि देदीप्यमान होते हैं, इसलिये ब्रह्म दीप्तिमान् है । और जो श्यामाक आदि अणुओं से भी अणु—सूक्ष्म है । ‘च’ शब्द से यह समझना चाहिये कि जो पृथिवी आदि स्थूल पदार्थों से भी अत्यन्त स्थूल है । जिसमें भूर्लोक आदि सम्पूर्ण लोक तथा उन लोकों के निवासी मनुष्यादि स्थित हैं, क्योंकि सारे पदार्थ चैतन्य के ही आश्रित प्रसिद्ध हैं, वही सबका आश्रयभूत यह अक्षर ब्रह्म है, वही प्राण है तथा वही वाणी और मन आदि समस्त इन्द्रियवर्ग है; उन सभी में चैतन्य ओतप्रोत है, क्योंकि प्राण और इन्द्रिय आदि का सारा संघात चैतन्य के ही आश्रित है, जैसा कि “वह प्राण का प्राण है” इत्यादि एक अन्य श्रुति से सिद्ध होता है ।

[इस प्रकार] प्राणादि के भीतर रहनेवाला जो अक्षर चैतन्य है वही यह सत्य यानी अवितथ है; अतः वह अमृत—अविनाशी है । उसका वेधन यानी मन से ताडन करना चाहिये । अर्थात् उसमें मन को समाहित करना चाहिये । हे सोम्य! क्योंकि ऐसी बात है, इसलिये तू वेधन कर यानी अपने चित्त को उस अक्षर में लगा दे ॥ २ ॥

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यदर्चिमद्दीप्तिमत्, दीप्त्या ह्यादित्यादि दीप्यत इति दीप्तिमद्ब्रह्म । किं च यदणुभ्यः श्यामाकादिभ्योऽप्यणु च सूक्ष्मम् । च शब्दात्स्थूलेभ्योऽप्यतिशयेन स्थूलं पृथिव्यादिभ्यः । यस्मिँल्लोका भूरादयो निहिताः स्थिताः, ये च लोकिनो लोकनिवासिनो मनुष्यादयश्चैतन्याश्रया हि सर्वे प्रसिद्धाः । तदेतत्सर्वाश्रयमक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनो वाक्च मनश्च सर्वाणि च करणानि तदन्तश्चैतन्यं चैतन्याश्रयो हि प्राणेन्द्रियादिसर्वसंघातः “प्राणस्य प्राणम्” (बृ० उ० ४ ।४ ।१८) इति श्रुत्यन्तरात् ।

यत्प्राणादीनामन्तश्चैतन्यमक्षरं तदेतत्सत्यमवितथमतोऽमृतमविनाशि तद्वेद्धव्यं मनसा ताडयितव्यम् । तस्मिन्मनःसमाधानं कर्तव्यमित्यर्थः । यस्मादेवं हे सोम्य विद्ध्यक्षरे चेतः समाधत्स्व ॥ २ ॥


ब्रह्मवेधन की विधि

उसका किस प्रकार वेधन करना चाहिये, सो बतलाया जाता है—
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कथं वेद्धव्यमित्युच्यते—