अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४ ॥
praṇavo dhanuḥ śaro hyātmā brahma tallakṣyamucyate .
apramattena veddhavyaṃ śaravattanmayo bhavet .. 4 ..
प्रणव यानी ओं कार धनुष है । जिस प्र कार शरासन (धनुष) लक्ष्य में बाण के प्रवेश कर जाने का साधन है उसी प्र कार [सोपाधिक] आत्मारूप बाण के अपने लक्ष्य अक्षर में प्रवेश करने का कारण ओं कार है । अभ्यास किये हुए प्रणव के द्वारा ही संस्कृत होकर वह उसके आश्रय से बिना किसी बाधा के अक्षरब्रह्म में इस प्र कार स्थित होता है, जै से धनुष से छोड़ा हुआ बाण अपने लक्ष्य में । अतः धनुष के समान होने से प्रणव ही धनुष है । तथा आत्मा ही बाण है, जो कि जल में प्रतिबिम्बित हुए सूर्य आदि के समान इस शरीर में सम्पूर्ण बौद्ध प्रतीतियों के साक्षीरूप से प्रविष्ट हो रहा है । वह बाण के समान अपने ही आत्मा (स्वरूपभूत) अक्षरब्रह्म में अनुप्रविष्ट हो रहा है । इसलिये ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है, क्योंकि मन को समाहित करने की इच्छावाले पुरुषों को वही आत्मभाव से लक्षित होता है ।
अतः ऐसा होने के अनन्तर अप्रमत्त—बाह्य विषयों की उपलब्धि की तृष्णारूप प्रमाद से रहित होकर अर्थात् सब ओर से विरक्त यानी जितेन्द्रिय होकर ए काग्रचित्त से ब्रह्मरूप अपने लक्ष्य का वेधन करना चाहिये और फिर उसका वेधन करने के अनन्तर बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिये । तात्पर्य यह कि जिस प्र कार बाण का अपने लक्ष्य से एकरूप हो जाना ही फल है उसी प्र कार देहादि में आत्मत्व की प्रतीति का तिरस् कार कर उस अक्षरब्रह्म से ए कात्मत्वरूप फल प्राप्त करे ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
प्रणव ओङ्कारो धनुः । यथेष्वसनं लक्ष्ये शरस्य प्रवेशकारणं तथात्मशरस्याक्षरे लक्ष्ये प्रवेशकारणमोङ्कारः । प्रणवेन ह्यभ्यस्यमानेन संस्क्रियमाणस्तदालम्बनोऽप्रतिबन्धेनाक्षरे- ऽवतिष्ठते, यथा धनुषास्त इषुर्लक्ष्ये । अतः प्रणवो धनुरिव धनुः । शरो ह्यात्मोपाधिलक्षणः पर एव जले सूर्यादिवदिह प्रविष्टो देहे सर्वबौद्धप्रत्ययसाक्षितया । स शर इव स्वात्मन्येवार्पितोऽक्षरे ब्रह्मण्यतो ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । लक्ष्य इव मनःसमाधित्सुभिः आत्मभावेन लक्ष्यमाणत्वात् ।
तत्रैवं सत्यप्रमत्तेन बाह्यविषयोपलब्धितृष्णाप्रमादवर्जितेन सर्वतो विरक्तेन जितेन्द्रियेणैकाग्रचित्तेन वेद्धव्यं ब्रह्म लक्ष्यम् । ततस्तद्वेधनादूर्ध्वं शरवत्तन्मयो भवेत् । यथा शरस्य लक्ष्यैकात्मत्वं फलं भवति तथा देहाद्यात्मप्रत्ययतिरस्करणेनाक्षरैकात्मत्वं फलमापादयेदित्यर्थः ॥ ४ ॥