मुण्डक 2 खण्ड 2 - मन्त्र 6

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः ।
ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ ६ ॥

arā iva rathanābhau saṃhatā yatra nāḍyaḥ sa eṣo’ntaścarate bahudhā jāyamānaḥ .
omityevaṃ dhyāyatha ātmānaṃ svasti vaḥ pārāya tamasaḥ parastāt .. 6 ..


रथचक्र की नाभि में जिस प्रकार अरे लगे होते हैं उसी प्रकार जिसमें सम्पूर्ण नाडियाँ एकत्रित होती हैं उस (हृदय)-के भीतर यह अनेक प्रकार से उत्पन्न हुआ संचार करता है । उस आत्मा का ‘ॐ’ इस प्रकार ध्यान करो । अज्ञान के उस पार गमन करने में तुम्हारा कल्याण हो [अर्थात् तुम्हें किसी प्रकार का विघ्न प्राप्त न हो] ॥ ६ ॥

अरों के समान अर्थात् जिस प्रकार रथ की नाभि में अरे समर्पित रहते हैं उसी प्रकार शरीर में सर्वत्र व्याप्त नाडियाँ जिस हृदय में संहत अर्थात् प्रविष्ट हैं उसके भीतर यह बौद्ध (बुद्धिजनित) प्रतीतियों का साक्षीभूत और जिसका प्रकरण चल रहा है वह आत्मा देखता, सुनता, मनन करता और जानता हुआ अन्तःकरणरूप उपाधि का अनुकरण करनेवाला होने से उसके हर्ष-क्रोधादि प्रत्ययों से मानो [नवीन-नवीनरूप से] उत्पन्न होता हुआ मध्य में संचार करता-वर्तमान रहता है । इसीसे लौकिक पुरुष ‘वह हर्षित हुआ, वह क्रोधित हुआ’ ऐसा कहा करते हैं । उस आत्मा को ‘ॐ’ इस प्रकार अर्थात् उपर्युक्त कल्पना से ओंकार को आलम्बन बनाकर ध्यान यानी चिन्तन करो ।

विद्वान् आचार्य को शिष्यों से जो कुछ कहना था वह कह दिया । इससे ब्रह्मविद्या के जिज्ञासु होने के कारण शिष्यगण भी सब कर्मों से उपरत होकर मोक्षमार्ग में जुट गये । अतः आचार्य उन्हें निर्विघ्नतापूर्वक ब्रह्मप्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं—‘पार अर्थात् पर तीर पर जाने के लिये तुम्हें स्वस्ति-निर्विघ्नता प्राप्त हो ।’ किसके पार जाने के लिये? अविद्यारूप अन्धकार के पार जाने के लिये अर्थात् अविद्यारहित ब्रह्मात्मस्वरूप की प्राप्ति के लिये ॥ ६ ॥

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अरा इव, यथा रथनाभौ समर्पिता अरा एवं संहताः सम्प्रविष्टा यत्र यस्मिन्हृदये सर्वतो देहव्यापिन्यो नाड्यस्तस्मिन्हृदये बुद्धिप्रत्ययसाक्षीभूतः स एष प्रकृत आत्मान्तर्मध्ये चरते चरति वर्तते; पश्यञ्शृण्वन्मन्वानो विजानन्बहुधानेकधा क्रोधहर्षादिप्रत्ययैर्जायमान इव जायमानोऽन्तःकरणोपाध्यनुविधायित्वाद्वदन्ति लौकिका हृष्टो जातः क्रुद्धो जात इति । तमात्मानम् ओमित्येवमोङ्कारालम्बनाः सन्तो यथोक्तकल्पनया ध्यायथ चिन्तयत ।

उक्तं वक्तव्यं च शिष्येभ्य आचार्येण जानता । शिष्याश्च ब्रह्मविद्याविविदिषुत्वान्निवृत्तकर्माणो मोक्षपथे प्रवृत्ताः । तेषां निर्विघ्नतया ब्रह्मप्राप्तिमाशास्त्याचार्यः । स्वस्ति निर्विघ्नमस्तु वो युष्माकं पाराय परकूलाय । परस्तात्कस्मादविद्यातमसः । अविद्यारहितब्रह्मात्मस्वरूपगमनायेत्यर्थः ॥ ६ ॥


अपर ब्रह्म का वर्णन तथा उसके चिन्तन का प्रकार

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि ।
दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥

yaḥ sarvajñaḥ sarvavidyasyaiṣa mahimā bhuvi .
divye brahmapure hyeṣa vyomnyātmā pratiṣṭhitaḥ ..


यह जो अज्ञानान्धकार के परे संसारमहासागर को पार करके जानेयोग्य परविद्या का प्रदेश है वह किस में वर्तमान है? इस पर कहते हैं—
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योऽसौ तमसः परस्तात्संसारमहोदधिं तीर्त्वा गन्तव्यः परविद्याविषय इति स कस्मिन्वर्तत इत्याह—