तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥ ७ ॥
manomayaḥ prāṇaśarīranetā pratiṣṭhito’nne hṛdayaṃ sannidhāya .
tadvijñānena paripaśyanti dhīrā ānandarūpamamṛtaṃ yadvibhāti .. 7 ..
‘जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है’ इसकी व्याख्या पहले (मु० उ० १ । १ । ९ में) की जा चुकी है । उसी के फिर और विशेषण बतलाते हैं—जिसकी यह प्रसिद्ध महिमा यानी विभूति है; वह महिमा क्या है? ये द्युलोक और पृथिवी जिसके शासन में धारण किये हुए (यानी स्थिरतापूर्वक) स्थित हैं जिसके शासन में सूर्य और चन्द्रमा अलातचक्र के समान निरन्तर घूमते रहते हैं, जिसके शासन में नदियाँ और समुद्र अपने स्थान का अतिक्रमण नहीं करते, इसी प्रकार स्थावर-जंगम जगत् जिसके शासन में नियमित रहता है; तथा ऋतु, अयन और वर्ष—ये भी जिसके शासन का उल्लंघन नहीं करते एवं कर्ता, कर्म और फल जिसके शासन से अपने-अपने काल का अतिक्रमण नहीं करते—ऐसी यह महिमा संसार में जिसकी है वह ऐसी महिमावाला सर्वज्ञ देव दिव्य—द्युतिमान् यानी समस्त बौद्ध (बुद्धिजनित) प्रत्ययों से होनेवाले प्रकाशयुक्त ब्रह्मपुर में—क्योंकि चैतन्यस्वरूप से इस (हृदयकमलस्थित आकाश)-में ब्रह्म की सर्वदा अभिव्यक्ति होती है, इसलिये हृदयकमल ब्रह्मपुर है, उसमें जो आकाश है उस हृदयपुण्डरीकान्तर्गत आकाश में प्रतिष्ठित (स्थित) हुआ-सा उपलब्ध होता है । इसके सिवा आकाशवत् सर्वव्यापक ब्रह्म का जाना-आना अथवा स्थित होना और किसी प्रकार सम्भव नहीं है ।
वहाँ (हृदयाकाश में) स्थित वही आत्मा मनोवृत्ति से ही अनुभव किया जाता है, इसलिये मनरूप उपाधिवाला होने से वह मनोमय है । तथा प्राण-शरीरनेता—प्राण और शरीर का नाम प्राणशरीर है, उसे यह एक स्थूल शरीर से दूसरे शरीर में ले जानेवाला है । यह हृदय अर्थात् बुद्धि को उसके पुण्डरीकाकाश में आश्रित कर अन्न यानी खाये हुए अन्न के परिणामरूप और निरन्तर बढ़ने-घटनेवाले पिण्डरूप अन्न (अन्नमय देह)-में स्थित है, क्योंकि हृदय में स्थित होना ही आत्मा की स्थिति है, अन्यथा अन्न में आत्मा की स्थिति नहीं है ।
धीर—विवेकी पुरुष शास्त्र और आचार्य के उपदेश से प्राप्त तथा शम, दम, ध्यान, सर्वत्याग एवं वैराग्य से उत्पन्न हुए विशेष ज्ञान द्वारा उस आत्मतत्त्व को सर्वत्र परिपूर्ण देखते यानी अनुभव करते हैं, जो आनन्दस्वरूप—सम्पूर्ण अनर्थ, दुःख और आयास से रहित, सुखस्वरूप एवं अमृतमय सर्वदा अपने अन्तःकरण में ही विशेषरूप से भास रहा है ॥ ७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यः सर्वज्ञः सर्वविद्व्याख्यातस्तं पुनर्विशिनष्टि; यस्यैष प्रसिद्धो महिमा विभूतिः । कोऽसौ महिमा? यस्येमे द्यावापृथिव्यौ शासने विधृते तिष्ठतः सूर्याचन्द्रमसौ यस्य शासनेऽलातचक्रवदजस्रं भ्रमतः । यस्य शासने सरितः सागराश्च स्वगोचरं नातिक्रामन्ति । तथा स्थावरं जङ्गमं च यस्य शासने नियतम् । तथा चर्तवोऽयने अब्दाश्च यस्य शासनं नातिक्रामन्ति । तथा कर्तारः कर्माणि फलं च यच्छासनात्स्वं स्वं कालं नातिवर्तन्ते स एष महिमा भुवि लोके यस्य स एष सर्वज्ञः एवमहिमा देवो दिव्ये द्योतनवति सर्वबौद्धप्रत्ययकृतद्योतने ब्रह्मपुरे, ब्रह्मणोऽत्र चैतन्यस्वरूपेण नित्याभिव्यक्तत्वाद्ब्रह्मणः पुरं हृदयपुण्डरीकं तस्मिन्यद्व्योम तस्मिन्व्योम्न्याकाशे हृत्पुण्डरीकमध्यस्थे, प्रतिष्ठित इवोपलभ्यते । न ह्याकाशवत्सर्वगतस्य गतिरागतिः प्रतिष्ठा वान्यथा सम्भवति ।
स ह्यात्मा तत्रस्थो मनोवृत्तिभिरेव विभाव्यत इति मनोमयो मन-उपाधित्वात्प्राणशरीरनेता प्राणश्च शरीरं च प्राणशरीरं तस्यायं नेता स्थूलाच्छरीराच्छरीरान्तरं प्रति । प्रतिष्ठितोऽवस्थितोऽन्ने भुज्यमानान्नविपरिणामे प्रतिदिनमुपचीयमानेऽपचीयमाने च पिण्डरूपान्ने हृदयं बुद्धिं पुण्डरीकच्छिद्रे संनिधाय समवस्थाप्य । हृदयावस्थानमेव ह्यात्मनः स्थितिर्न ह्यात्मनः स्थितिरन्ने ।
तदात्मतत्त्वं विज्ञानेन विशिष्टेन शास्त्राचार्योपदेशजनितेन ज्ञानेन शमदमध्यानसर्वत्यागवैराग्योद्भूतेन परिपश्यन्ति सर्वतः पूर्णं पश्यन्त्युपलभन्ते धीरा विवेकिन आनन्दरूपं सर्वानर्थदुःखायासप्रहीणममृतं यद्विभाति विशेषेण स्वात्मन्येव भाति सर्वदा ॥ ७ ॥