tayoranyaḥ pippalaṃ svādvattyanaśnannanyo abhicākaśīti .. 1 ..
[जीव और ईश्वररूप] दो सुपर्ण—सुन्दर पर्णवाले अर्थात् [नियम्य-नियामकभाव की प्राप्तिरूप] शोभन पतनवाले अथवा पक्षियों के समान [वृक्ष पर निवास तथा फलभोग करनेवाले] होने से सुपर्ण—पक्षी तथा सयुज—सर्वदा साथ-साथ ही रहनेवाले और सखा यानी समान आख्यानवाले अर्थात् जिनकी अभिव्यक्ति का कारण समान है ऐसे दो सुपर्ण समान—सामान्यरूप से [दोनों की] उपलब्धि का कारण होने से एक ही वृक्ष—वृक्ष के समान उच्छेद में समानता होने के कारण शरीररूप वृक्ष पर आलिंगन किये हुए हैं, अर्थात् फलोपभोग के लिये पक्षियों के समान एक ही वृक्ष पर निवास करते हैं ।
अव्यक्तरूप मूल से उत्पन्न हुआ सम्पूर्ण प्राणियों के कर्मफल का आश्रयभूत यह क्षेत्रसंज्ञक अश्वत्थवृक्ष ऊपर को मूल और नीचे की ओर शाखाओंवाला है । उस वृक्ष पर अविद्या, काम, कर्म और वासना के आश्रयभूत लिंगदेहरूप उपाधिवाले जीव और ईश्वर दो पक्षियों के समान आलिंगन किये निवास करते हैं । इस प्रकार आलिंगन करके रहनेवाले उन दोनों में से एक—लिंगोपाधिरूप वृक्ष को आश्रित करनेवाले क्षेत्रज्ञ पिप्पल यानी अपने कर्म से प्राप्त होनेवाला सुख-दुःखरूप फल, जो अनेक प्रकार से विचित्र अनुभवरूप स्वाद के कारण स्वादु है, खाता—भक्षण करता यानी अविवेकवश भोगता है । किन्तु अन्य—दूसरा, जो नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप सर्वज्ञ मायोपाधिक ईश्वर है, उसे ग्रहण न करता हुआ नहीं भोगता । यह तो साक्षित्वरूप सत्तामात्र से भोक्ता और भोग्य दोनों का प्रेरक ही है । अतः वह दूसरा तो फलभोग न करके केवल देखता ही है—उसका प्रेरकत्व तो राजा के समान केवल दर्शनमात्र ही है ॥ १ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
द्वा द्वौ सुपर्णा सुपर्णौ शोभनपतनौ सुपर्णौ पक्षिसामान्याद्वा सुपर्णौ सयुजा सयुजौ सहैव सर्वदा युक्तौ सखाया सखायौ समानाख्यानौ समानाभिव्यक्तिकारणावेवं भूतौ सन्तौ समानमविशेषमुपलब्ध्यधिष्ठानतयैकं वृक्षं वृक्षमिवोच्छेदनसामान्याच्छरीरं वृक्षं परिषस्वजाते परिष्वक्तवन्तौ सुपर्णाविवैकं वृक्षं फलोपभोगार्थम् ।
अयं हि वृक्ष ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाखोऽश्वत्थोऽव्यक्तमूलप्रभवः क्षेत्रसंज्ञकः सर्वप्राणिकर्मफलाश्रयस्तं परिष्वक्तौ सुपर्णाविवाविद्याकामकर्मवासनाश्रयलिङ्गोपाध्यात्मेश्वरौ । तयोः परिष्वक्तयोरन्य एकः क्षेत्रज्ञो लिङ्गोपाधिवृक्षमाश्रितः पिप्पलं कर्मनिष्पन्नं सुखदुःखलक्षणं फलं स्वाद्वनेकविचित्रवेदनास्वादरूपं स्वाद्वत्ति भक्षयत्युपभुङ्क्तेऽविवेकतः । अनश्नन्नन्य इतर ईश्वरो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः सर्वज्ञः सर्वसत्त्वोपाधिरीश्वरो नाश्नाति । प्रेरयिता ह्यसावुभयोर्भोज्यभोक्त्रोर्नित्यसाक्षित्वसत्तामात्रेण । स त्वनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति पश्यत्येव केवलम् । दर्शनमात्रं हि तस्य प्रेरयितृत्वं राजवत् ॥ १ ॥