यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः ॥ १० ॥
तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद् भूतिकामः ॥ १० ॥
yaṃ yaṃ lokaṃ manasā saṃvibhāti viśuddhasattvaḥ kāmayate yāṃśca kāmān .
taṃ taṃ lokaṃ jayate tāṃśca kāmāṃstasmādātmajñaṃ hyarcayed bhūtikāmaḥ .. 10 ..
वह विशुद्धचित्त आत्मवेत्ता मन से जिस-जिस लोक की भावना करता है और जिन-जिन भोगों को चाहता है वह उसी-उसी लोक और उन्हीं-उन्हीं भोगों को प्राप्त कर लेता है । इसलिये ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाला पुरुष आत्मज्ञानी की पूजा करे ॥ १० ॥
विशुद्धसत्त्व—जिसके क्लेश क्षीण हो गये हैं वह निर्मलचित्त आत्मवेत्ता जिस पितृलोक आदि लोक की मन से इच्छा करता है अर्थात् ऐसा संकल्प करता है कि मुझे या किसी अन्य को अमुक लोक प्राप्त हो अथवा वह जिन कामना यानी भोगों की अभिलाषा करता है उसी-उसी लोक तथा अपने संकल्प किये हुए उन्हीं-उन्हीं भोगों को वह प्राप्त कर लेता है । अतः ऐश्वर्य की इच्छा करनेवाला पुरुष उस विशुद्धचित्त आत्मज्ञानी का पाद-प्रक्षालन, शुश्रूषा एवं नमस्कारादि द्वारा पूजन करे, क्योंकि विद्वान् सत्यसंकल्प होता है । इसलिये (सत्यसंकल्प होने के कारण) वह पूजनीय ही है ॥ १० ॥
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यं यं लोकं पित्र्यादिलक्षणं मनसा संविभाति संकल्पयति मह्यमन्यस्मै वा भवेदिति विशुद्धसत्त्वः क्षीणक्लेश आत्मविन्निर्मलान्तःकरणः कामयते यांश्च कामान्प्रार्थयते भोगांस्तं तं लोकं जयते प्राप्नोति तांश्च कामान्संकल्पितान्भोगान् । तस्माद्विदुषः सत्यसंकल्पत्वादात्मज्ञमात्मज्ञानेन विशुद्धान्तःकरणं ह्यर्चयेत् पूजयेत्पादप्रक्षालनशुश्रूषानमस्कारादिभिर्भूतिकामो विभूतिमिच्छुः । ततः पूजार्ह एवासौ ॥ १० ॥
इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये तृतीयमुण्डके प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
आत्मवेत्ता की पूजा का फल
क्योंकि
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यस्मात्—