मुण्डक 3 खण्ड 1 - मन्त्र 2

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २ ॥

samāne vṛkṣe puruṣo nimagno’nīśayā śocati muhyamānaḥ .
juṣṭaṃ yadā paśyatyanyamīśamasya mahimānamiti vītaśokaḥ .. 2 ..


[ईश्वर के साथ] एक ही वृक्ष पर रहनेवाला जीव अपने दीनस्वभाव के कारण मोहित होकर शोक करता है । वह जिस समय [ध्यान द्वारा] अपने से विलक्षण योगिसेवित ईश्वर और उसकी महिमा [संसार]-को देखता है उस समय शोकरहित हो जाता है ॥ २ ॥

समान वृक्ष पर यानी पूर्वोक्त शरीर में अविद्या, कामना, कर्मफल और रागादि के भारी भार से आक्रान्त होकर समुद्र के जल में डूबे हुए तूँबे के समान निमग्न—निश्चयपूर्वक देहात्मभाव को प्राप्त हुआ यह भोक्ता जीव ‘मैं यही हूँ’, ‘मैं अमुक का पुत्र हूँ’, ‘इसका नाती हूँ’, ‘कृश हूँ’, ‘स्थूल हूँ’, ‘गुणवान् हूँ’, ‘गुणहीन हूँ’, ‘सुखी हूँ’, ‘दुःखी हूँ’ इत्यादि प्रकार के प्रत्ययोंवाला होने से तथा ‘इस देह से भिन्न और कुछ नहीं है’ ऐसा समझने के कारण उत्पन्न होता, मरता एवं अपने सम्बन्धियों से मिलता और बिछुड़ता रहता है ।

अतः अनीशावश—‘मैं किसी कार्य के लिये समर्थ नहीं हूँ, मेरा पुत्र नष्ट हो गया और स्त्री भी मर गयी, अब मेरे जीवन से क्या लाभ है? ‘—इस प्रकार के दीनभाव को अनीशा कहते हैं, उससे युक्त होकर अविवेकवश अनेकों अनर्थमय प्रकारों से मोहित अर्थात् आन्तरिक चिन्ता को प्राप्त हुआ वह शोक यानी सन्ताप करता रहता है ।

इस प्रकार प्रेत, तिर्यक् और मनुष्यादि योनियों में निरन्तर लघुता को प्राप्त हुआ वह जिस समय अनेकों जन्मों में कभी अपने शुद्ध धर्म के संचय के कारण किसी परम कारुणिक गुरु के द्वारा योगमार्ग दिखलाये जाने पर अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, सर्वत्याग और शम-दमादि से सम्पन्न तथा समाहितचित्त होकर ध्यान करने पर अनेकों योगमार्गों और कर्मों द्वारा सेवित अन्य—वृक्षरूप उपाधि से विलक्षण ईश्वर यानी भूख, प्यास, शोक, मोह और जरा-मृत्यु आदि से अतीत संसारधर्मशून्य सम्पूर्ण जगत् के स्वामी को ‘मैं यह सम्पूर्ण भूतों में स्थित और सबके लिये समान आत्मा ही हूँ, अविद्याजनित उपाधि से परिच्छिन्न दूसरा मायात्मा नहीं हूँ’ इस प्रकार देखता है तथा उसकी महिमा यानी जगद्रूप विभूति को ‘यह इस परमेश्वरस्वरूप मेरी ही है’ इस प्रकार [जानता है] उस समय वह शोकरहित हो जाता है—सम्पूर्ण शोकसागर से मुक्त हो जाता है अर्थात् कृतकृत्य हो जाता है ॥ २ ॥

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समाने वृक्षे यथोक्ते शरीरे पुरुषो भोक्ता जीवोऽविद्याकामकर्मफलरागादिगुरुभाराक्रान्तोऽलाबुरिव सामुद्रे जले निमग्नो निश्चयेन देहात्मभावमापन्नोऽयमेवाहममुष्य पुत्रोऽस्य नप्ता कृशः स्थूलो गुणवान्निर्गुणः सुखी दुःखीत्येवं प्रत्ययो नास्त्यन्योऽस्मादिति जायते म्रियते संयुज्यते वियुज्यते च सम्बन्धिबान्धवैः ।

अतोऽनीशया न कस्यचित् समर्थोऽहं पुत्रो मम विनष्टो मृता मे भार्या किं मे जीवितेनेत्येवं दीनभावोऽनीशा तया शोचति सन्तप्यते मुह्यमानोऽनेकैरनर्थप्रकारैरविवेकतया चिन्तामापद्यमानः ।

स एवं प्रेततिर्यङ्मनुष्यादियोनिष्वजवं जवीभावमापन्नः कदाचिदनेकजन्मसु शुद्धधर्मसञ्चितनिमित्ततः केनचित्परमकारुणिकेन दर्शितयोगमार्गोऽहिंसासत्यब्रह्मचर्यसर्वत्यागशमदमादिसम्पन्नः समाहितात्मा सन् जुष्टं सेवितमनेकैर्योगमार्गैः कर्मभिश्च यदा यस्मिन्काले पश्यति ध्यायमानोऽन्यं वृक्षोपाधिलक्षणाद्विलक्षणमीशमसंसारिणमशनायापिपासाशोकमोहजरामृत्यतीतमीशं सर्वस्य जगतोऽयमहमस्म्यात्मा सर्वस्य समः सर्वभूतस्थो नेतरोऽविद्याजनितोपाधिपरिच्छिन्नो मायात्मेति विभूतिं महिमानं च जगद्रूपमस्यैव मम परमेश्वरस्येति यदैवं द्रष्टा तदा वीतशोको भवति सर्वस्माच्छोकसागराद्विप्रमुच्यते कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः ॥ २ ॥


यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।

yadā paśyaḥ paśyate rukmavarṇaṃ kartāramīśaṃ puruṣaṃ brahmayonim .


दूसरा मन्त्र भी इसी बात को विस्तारपूर्वक बतलाता है—
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अन्योऽपि मन्त्र इममेवार्थमाह सविस्तरम्—