तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३ ॥
tadā vidvānpuṇyapāpe vidhūya nirañjanaḥ paramaṃ sāmyamupaiti .. 3 ..
जिस समय द्रष्टा सुवर्णवर्ण और ब्रह्मा के भी उत्पत्तिस्थान उस जगत्कर्ता ईश्वर पुरुष को देखता है उस समय वह विद्वान् पाप-पुण्य दोनों को त्यागकर निर्मल हो अत्यन्त समता को प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥
जिस समय देखनेवाला होने के कारण पश्य—द्रष्टा विद्वान् अर्थात् साधक रुक्मवर्ण—स्वयंप्रकाशस्वरूप अथवा सुवर्ण के समान जिसका प्रकाश अविनाशी है उस सकल-जगत्कर्ता ईश्वर पुरुष ब्रह्मयोनि को—जो ब्रह्म है और योनि भी है अथवा जो अपर ब्रह्म (ब्रह्मा)-की योनि है उस ब्रह्मयोनि को इस प्रकार पूर्ववत् देखता है उस समय वह विद्वान् द्रष्टा पुण्य-पाप यानी अपने बन्धनभूत कर्मों को समूल त्यागकर—भस्म करके निरंजन—निर्लेप अर्थात् क्लेशरहित होकर अद्वयरूप परम—उत्कृष्ट यानी निरतिशय समता को प्राप्त हो जाता है । द्वैतविषयक समता इस अद्वैतरूप साम्य से निकृष्ट ही है; अतः वह अद्वैतरूप परम साम्य को प्राप्त हो जाता है ॥ ३ ॥
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यदा यस्मिन्काले पश्यः पश्यतीति विद्वान्साधक इत्यर्थः । पश्यते पश्यति पूर्ववद्रुक्मवर्णं स्वयंज्योतिःस्वभावं रुक्मस्येव वा ज्योतिरस्याविनाशि कर्तारं सर्वस्य जगत ईशं पुरुषं ब्रह्मयोनिं ब्रह्म च तद्योनिश्चासौ ब्रह्मयोनिस्तं ब्रह्मयोनिं ब्रह्मणो वापरस्य योनिं स यदा चैवं पश्यति तदा स विद्वान्पश्यः पुण्यपापे बन्धनभूते कर्मणी समूले विधूय निरस्य दग्ध्वा निरञ्जनो निर्लेपो विगतक्लेशः परमं प्रकृष्टं निरतिशयं साम्यं समतामद्वयलक्षणं द्वैतविषयाणि साम्यान्यतोऽर्वाञ्च्येवातोऽद्वयलक्षणमेतत्परं साम्यमुपैति प्रतिपद्यते ॥ ३ ॥
श्रेष्ठतम ब्रह्मज्ञ
तथा—
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किं च—