आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४ ॥
prāṇo hyeṣa yaḥ sarvabhūtairvibhāti vijānanvidvānbhavate nātivādī .
ātmakrīḍa ātmaratiḥ kriyāvāneṣa brahmavidāṃ variṣṭhaḥ .. 4 ..
यह जो प्राण का-प्राण परमेश्वर है वह प्रकृत [परमात्मा] ही सम्पूर्ण भूतों—ब्रह्मा से लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणियों के द्वारा अर्थात् सर्वभूतस्थ सर्वात्मा होकर विभासित यानी विविध प्रकार से देदीप्यमान हो रहा है । ‘सर्वभूतैः’ इस पद में इत्थंभूतलक्षणा तृतीया है । इस प्रकार जो विद्वान् उस सर्वभूतस्थ प्राण को ‘मैं यही हूँ’ ऐसा साक्षात् आत्मस्वरूप से जाननेवाला है वह उस वाक्य के अर्थज्ञानमात्र से भी नहीं होता । क्या नहीं होता? [इस पर कहते हैं—] अतिवादी नहीं होता ।
जिसका स्वभाव और सबका अतिक्रमण करके बोलने का होता है उसे अतिवादी कहते हैं ।
तात्पर्य यह कि जो इस प्रकार प्राण-के-प्राण साक्षात् आत्मा को जाननेवाला है वह अतिवादी नहीं होता । जबकि उसने यह देखा है कि सब आत्मा ही है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है तब वह किसका अतिक्रमण करके बोलेगा? जिसकी दृष्टि में कुछ और दीखनेवाला पदार्थ है वही उसका अतिक्रमण करके बोलता है । किन्तु यह विद्वान् तो आत्मा से भिन्न न कुछ देखता है, न सुनता है और न कुछ जानता ही है । इसलिये यह अतिवादन भी नहीं करता ।
यही नहीं, वह [आत्मक्रीड, आत्मरति और क्रियावान् हो जाता है ।] आत्मक्रीड—जिसकी आत्मा में ही क्रीडा हो, अन्य स्त्री-पुत्रादि में न हो उसे आत्मक्रीड कहते हैं; तथा जिसकी आत्मा में ही रति—रमण यानी प्रीति हो वह आत्मरति कहलाता है । क्रीडा बाह्य साधन की अपेक्षा रखनेवाली होती है और रति साधन की अपेक्षा न करके बाह्य विषय की प्रीतिमात्र को कहते हैं—यही इन दोनों में विशेषता (अन्तर) है । तथा क्रियावान् अर्थात् जिसकी ज्ञान, ध्यान एवं वैराग्यादि क्रियाएँ हों उसे क्रियावान् कहते हैं । किन्तु [‘आत्मरति-क्रियावान्’ ऐसा] समासयुक्त पाठ होने पर ‘आत्मरति ही जिसकी क्रिया है’ [ऐसा अर्थ होने से] बहुव्रीहि समास और ‘मतुप्’ प्रत्यय का अर्थ—इन दोनों में से एक (मतुप्-प्रत्यय का अर्थ) अधिक हो जाता है ।
कोई-कोई (समुच्चयवादी) तो [आत्मरति और क्रियावान् इन दोनों विशेषणों को] अग्निहोत्रादि कर्म और ब्रह्मविद्या के समुच्चय के लिये समझते हैं । किन्तु उनका यह अभिप्राय ‘ब्रह्मविदां वरिष्ठः’ इस मुख्यार्थवाची कथन से विरुद्ध है । बाह्यक्रियावान् पुरुष आत्मक्रीड और आत्मरति हो ही नहीं सकता । कोई भी पुरुष बाह्यक्रिया से निवृत्त होकर ही आत्मक्रीड हो सकता है, क्योंकि बाह्यक्रिया और आत्मक्रीडा का परस्पर विरोध है । अन्धकार और प्रकाश की एक स्थान पर एक ही समय स्थिति हो ही नहीं सकती ।
अतः इस वचन के द्वारा यह ज्ञान और कर्म के समुच्चय का प्रतिपादन मिथ्या प्रलाप ही है । यही बात “अन्या वाचो विमुञ्चथ” “संन्यासयोगात्” इत्यादि श्रुतियों से भी सिद्ध होती है । अतएव इस जगह उसी को ‘क्रियावान्’ कहा है जो ज्ञान-ध्यानादि क्रियाओंवाला और आर्यमर्यादा का भंग न करनेवाला संन्यासी है । जो ऐसे लक्षणोंवाला अनतिवादी, आत्मक्रीड, आत्मरति और क्रियावान् ब्रह्मनिष्ठ है वही समस्त ब्रह्मवेत्ताओं में वरिष्ठ यानी प्रधान है ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
योऽयं प्राणस्य प्राणः पर ईश्वरो ह्येष प्रकृतः सर्वैर्भूतैर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तैः, इत्थंभूतलक्षणे तृतीया, सर्वभूतस्थः सर्वात्मा सन्नित्यर्थः, विभाति विविधं दीप्यते । एवं सर्वभूतस्थं यः साक्षादात्मभावेनायमहमस्मीति विजानन्विद्वान्वाक्यार्थज्ञानमात्रेण स भवते भवति न भवतीत्येतत् किमतिवाद्यतीत्य सर्वानन्यान् वदितुं शीलमस्येत्यतिवादी ।
यस्त्वेवं साक्षादात्मानं प्राणस्य प्राणं विद्वानतिवादी स न भवतीत्यर्थः । सर्वं यदात्मैव नान्यदस्तीति दृष्टं तदा किं ह्यसावतीत्य वदेत् । यस्य त्वपरमन्यद् दृष्टमस्ति स तदतीत्य वदति । अयं तु विद्वानात्मनोऽन्यन्न पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति । अतो नातिवदति ।
किं चात्मक्रीड आत्मन्येव च क्रीडा क्रीडनं यस्य नान्यत्र पुत्रदारादिषु स आत्मक्रीडः । तथात्मरतिरात्मन्येव च रती रमणं प्रीतिर्यस्य स आत्मरतिः । क्रीडा बाह्यसाधनापेक्षा, रतिस्तु साधननिरपेक्षा बाह्यविषयप्रीतिमात्रमिति विशेषः । तथा क्रियावाञ्ज्ञानध्यानवैराग्यादिक्रिया यस्य सोऽयं क्रियावान् । समासपाठ आत्मरतिरेव क्रियास्य विद्यत इति बहुव्रीहिमतुबर्थयोरन्यतरोऽतिरिच्यते ।
केचित्त्वग्निहोत्रादिकर्मब्रह्मसमुच्चयवादिमत- विद्ययोः समुच्चयार्थखण्डनम् मिच्छन्ति । तच्चैष ब्रह्मविदां वरिष्ठ इत्यनेन मुख्यार्थवचनेन विरुध्यते । न हि बाह्यक्रियावानात्मक्रीड आत्मरतिश्च भवितुं शक्तः, कश्चिद्वाह्यक्रियाविनिवृत्तो ह्यात्मक्रीडो भवति बाह्यक्रियात्मक्रीडयोर्विरोधात् । न हि तमःप्रकाशयोर्युगपदेकत्र स्थितिः संभवति ।
तस्मादसत्प्रलपितमेवैतदनेन ज्ञानकर्मसमुच्चयप्रतिपादनम् । “अन्या वाचो विमुञ्चथ” (मु० उ० २ ।२ ।५) “संन्यासयोगात्” (मु० उ० ३ ।२ ।६) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । तस्मादयमेवेह क्रियावान्यो ज्ञानध्यानादिक्रिया- वानसंभिन्नार्यमर्यादः संन्यासी । य एवं लक्षणो नातिवाद्यात्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावान्ब्रह्मनिष्ठः स ब्रह्मविदां सर्वेषां वरिष्ठः प्रधानः ॥ ४ ॥