मुण्डक 3 खण्ड 1 - मन्त्र 5

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ।
अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५ ॥

satyena labhyastapasā hyeṣa ātmā samyagjñānena brahmacaryeṇa nityam .
antaḥśarīre jyotirmayo hi śubhro yaṃ paśyanti yatayaḥ kṣīṇadoṣāḥ .. 5 ..


यह आत्मा सर्वदा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । जिसे दोषहीन योगिजन देखते हैं वह ज्योतिर्मय शुभ्र आत्मा शरीर के भीतर रहता है ॥ ५ ॥

[यह आत्मा] सत्य से अर्थात् अनृत यानी मिथ्याभाषण के त्यागद्वारा प्राप्त किया जा सकता है । तथा “मन और इन्द्रियों की एकाग्रता ही परम तप है’’ इस स्मृति के अनुसार तप यानी इन्द्रिय और मन की एकाग्रता से भी [इस आत्मा की उपलब्धि हो सकती है], क्योंकि आत्मदर्शन के अभिमुख रहने के कारण यही तप उसका अनुकूल परम साधन है—दूसरा चान्द्रायणादि तप उसका साधन नहीं है [इसके सिवा] सम्यग्ज्ञान—यथार्थ आत्मदर्शन और ब्रह्मचर्य—मैथुन के त्याग से भी नित्य अर्थात् सर्वदा [इस आत्मा की प्राप्ति हो सकती है]; यहाँ ‘एष आत्मा लभ्यः’ (इस आत्मा की प्राप्ति हो सकती है) इस वाक्य का सर्वत्र सम्बन्ध है । ‘सर्वदा सत्य से’, ‘सर्वदा तप से’ और ‘सर्वदा सम्यग्ज्ञान से’ इस प्रकार अन्तर्दीपिकान्याय से (मध्यवर्ती दीपकों के समान) सभी के साथ ‘नित्य’ शब्द का सम्बन्ध लगाना चाहिये; जैसा कि आगे (प्रश्नोपनिषद् में) कहेंगे भी “जिन पुरुषों में कुटिलता, अनृत और माया नहीं है’’ इत्यादि ।

जो आत्मा इन साधनों से प्राप्त किया जाता है वह कौन है—इसपर कहा जाता है—‘अन्तःशरीरे’ अर्थात् शरीर के भीतर पुण्डरीकाकाश में जो ज्योतिर्मय सुवर्णवर्ण शुभ्र यानी शुद्ध आत्मा है, जिसे कि क्षीणदोष यानी जिनके क्रोधादि मनोमल क्षीण हो गये हैं वे यतिजन—यत्नशील संन्यासी लोग देखते अर्थात् उपलब्ध करते हैं । तात्पर्य यह है कि वह आत्मा सर्वदा सत्यादि साधनों से ही संन्यासियोंद्वारा प्राप्त किया जा सकता है—कभी-कभी व्यवहार किये जानेवाले सत्यादि से प्राप्त नहीं होता । वह अर्थवाद सत्यादि साधनों की स्तुति के लिये है ॥ ५ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

सत्येनानृतत्यागेन मृषावदनत्यागेन लभ्यः प्राप्तव्यः । किं च तपसा हीन्द्रियमनएकाग्रतया “मनसश्चेन्द्रियाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः’’ (महा० शा० २५० ।४) इति स्मरणात् । तद्ध्यनुकूलमात्मदर्शनाभिमुखीभावात्परमं साधनं तपो नेतरच्चान्द्रायणादि । एष आत्मा लभ्य इत्यनुषङ्गः सर्वत्र । सम्यग्ज्ञानेन यथाभूतात्मदर्शनेन ब्रह्मचर्येण मैथुनासमाचारेण । नित्यं सर्वदा नित्यं सत्येन नित्यं तपसा नित्यं सम्यग्ज्ञानेनेति सर्वत्र नित्यशब्दोऽन्तर्दीपिकान्यायेन अनुषक्तव्यः । वक्ष्यति च—“न येषु जिह्यमनृतं न माया च’’ (प्र० उ० १ ।१६) इति ।

कोऽसावात्मा य एतैः साधनैर्लभ्य इत्युच्यते । अन्तःशरीरेऽन्तर्मध्ये शरीरस्य पुण्डरीकाकाशे ज्योतिर्मयो हि रुक्मवर्णः शुभ्रः शुद्धो यमात्मानं पश्यन्त्युपलभन्ते यतयो यतनशीलाः संन्यासिनः क्षीणदोषाः क्षीणक्रोधादिचित्तमलाः । स आत्मा नित्यं सत्यादिसाधनैः संन्यासिभिर्लभ्यते । न कादाचित्कैः सत्यादिभिः लभ्यते । सत्यादिसाधनस्तुत्यर्थोऽयमर्थवादः ॥ ५ ॥