येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६ ॥
satyameva jayati nānṛtaṃ satyena panthā vitato devayānaḥ .
yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tatsatyasya paramaṃ nidhānam .. 6 ..
सत्य अर्थात् सत्यवान् ही जय को प्राप्त होता है, मिथ्या यानी मिथ्यावादी नहीं । [यह ‘सत्य’ और ‘अनृत’ का सत्यवान् और मिथ्यावादी अर्थ इसलिये किया गया है कि] पुरुष का आश्रय न करनेवाले केवल सत्य और मिथ्या का ही जय या पराजय नहीं हो सकता । लोक में प्रसिद्ध ही है कि सत्यवादी से मिथ्यावादी को ही नीचा देखना पड़ता है, इसके विपरीत नहीं होता । इससे सत्य का प्रबल साधनत्व सिद्ध होता है ।
यही नहीं, सत्य का उत्कृष्ट साधनत्व शास्त्र से भी जाना जाता है । किस प्रकार?
[सो बतलाते हैं—] सत्य अर्थात् यथार्थ वचन की व्यवस्था से देवयानसंज्ञक मार्ग विस्तीर्ण यानी नैरन्तर्य से प्रवृत्त होता है, जिस मार्ग से कपट, छल, शठता, अहंकार, दम्भ और अनृत से रहित तथा सब ओर से पूर्णकाम और तृष्णारहित ऋषिगण—[अतीन्द्रिय वस्तु को] देखनेवाले पुरुष [उस पद पर] आरूढ़ होते हैं, जिसमें कि सत्यसंज्ञक उत्कृष्ट साधन का सम्बन्धी उसका साध्यरूप परमार्थतत्त्व जो पुरुषार्थरूप से निहित होने के कारण निधान है वह परम यानी प्रकृष्ट निधान वर्तमान है । ‘उस पद में जिस मार्ग से आरूढ़ होते हैं वह सत्य से ही विस्तीर्ण हो रहा है’—इस प्रकार इसका पूर्ववाक्य से सम्बन्ध है ॥ ६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
सत्यमेव सत्यवानेव जयति नानृतं नानृतवादीत्यर्थः । न हि सत्यानृतयोः केवलयोः पुरुषानाश्रितयोर्जयः पराजयो वा सम्भवति । प्रसिद्धं लोके सत्यवादिनानृतवाद्यभिभूयते न विपर्ययोऽतः सिद्धं सत्यस्य बलवत्साधनत्वम् ।
किं च शास्त्रतोऽप्यवगम्यते सत्यस्य साधनातिशयत्वम् । कथम्?
सत्येन यथाभूतवादव्यवस्थया पन्था देवयानाख्यो विततो विस्तीर्णः सातत्येन प्रवृत्तो येन यथा ह्याक्रमन्ति क्रमन्त ऋषयो दर्शनवन्तः कुहकमायाशाठ्याहंकारदम्भानृतवर्जिता ह्याप्तकामा विगततृष्णाः सर्वतो यत्र यस्मिंस्तत्परमार्थतत्त्वं सत्यस्योत्तमसाधनस्य सम्बन्धि साध्यं परमं प्रकृष्टं निधानं पुरुषार्थरूपेण निधीयत इति निधानं वर्तते । तत्र च येन पथाक्रमन्ति स सत्येन वितत इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ६ ॥