दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७ ॥
bṛhacca taddivyamacintyarūpaṃ sūkṣmācca tatsūkṣmataraṃ vibhāti .
dūrātsudūre tadihāntike ca paśyatsvihaiva nihitaṃ guhāyām .. 7 ..
सत्यादि जिसकी प्राप्ति के साधन हैं वह प्रकृत ब्रह्म सब ओर व्याप्त होने के कारण बृहत्—महान् है । वह दिव्य—स्वयंप्रभ यानी इन्द्रियों का अविषय है, इसलिये जिसका रूप चिन्तन न किया जा सके ऐसा अचिन्त्यरूप है । वह आकाशादि सूक्ष्म पदार्थों से भी सूक्ष्मतर है । सबका कारण होने से इसकी सूक्ष्मता सबसे अधिक है । इस प्रकार वह सूर्य-चन्द्र आदि रूपों से अनेक प्रकार भासित यानी दीप्त हो रहा है ।
इसके सिवा वह ब्रह्म अज्ञानियों के लिये अत्यन्त अगम्य होने के कारण दूर यानी दूरस्थ देश से भी अधिक दूर—अत्यन्त दूरस्थ देश में वर्तमान है; तथा विद्वानों का आत्मा होने के कारण इस शरीर में अत्यन्त समीप भी है । यह श्रुति के कथनानुसार सबके भीतर रहनेवाला होने से आकाश के भीतर भी स्थित है । यह इस लोक में ‘पश्यत्सु’ अर्थात् चेतनावान् प्राणियों में योगियों द्वारा दर्शनादि-क्रियावत्त्वरूप से स्थित देखा जाता है । कहाँ देखा जाता है? उनकी बुद्धिरूप गुहा में । यह विद्वानों को उसी में छिपा हुआ दिखायी देता है ।
तो भी अविद्या से आच्छादित रहने के कारण यह अज्ञानियों को वहाँ स्थित रहने पर भी दिखायी नहीं देता ॥ ७ ॥
तात्पर्य पढ़ें
बृहन्महच्च तत्प्रकृतं ब्रह्म सत्यादिसाधनं सर्वतो व्याप्तत्वात् । दिव्यं स्वयंप्रभमनिन्द्रियगोचरमत एव न चिन्तयितुं शक्यतेऽस्य रूपमित्यचिन्त्यरूपम् । सूक्ष्मादाकाशादेरपि तत्सूक्ष्मतरम्, निरतिशयं हि सौक्ष्म्यमस्य सर्वकारणत्वात्, विभाति विविधमादित्यचन्द्राद्याकारेण भाति दीप्यते ।
किं च दूराद्विप्रकृष्टदेशात्सुदूरे विप्रकृष्टतरे देशे वर्ततेऽविदुषामत्यन्तागम्यत्वात्तद्ब्रह्म । इह देहेऽन्तिके समीपे च विदुषामात्मत्वात् । सर्वान्तरत्वाच्चाकाशस्याप्यन्तरश्रुतेः । इह पश्यत्सु चेतनावत्स्वित्येतन्निहितं स्थितं दर्शनादिक्रियावत्त्वेन योगिभिर्लक्ष्यमाणम् । क्व? गुहायां बुद्धिलक्षणायाम् । तत्र हि निगूढं लक्ष्यते विद्वद्भिः ।
तथाप्यविद्यया संवृतं सन्न लक्ष्यते तत्रस्थमेवाविद्वद्भिः ॥ ७ ॥