मुण्डक 3 खण्ड 1 - मन्त्र 8

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८ ॥

na cakṣuṣā gṛhyate nāpi vācā nānyairdevaistapasā karmaṇā vā .
jñānaprasādena viśuddhasattvastatastu taṃ paśyate niṣkalaṃ dhyāyamānaḥ .. 8 ..


[यह आत्मा] न नेत्र से ग्रहण किया जाता है, न वाणी से, न अन्य इन्द्रियों से और न तप अथवा कर्म से ही । ज्ञान के प्रसाद से पुरुष विशुद्धचित्त हो जाता है और तभी वह ध्यान करने पर उस निष्कल आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करता है ॥ ८ ॥

क्योंकि रूपहीन होने के कारण यह आत्मा किसी से भी नेत्रद्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता, अवाच्य होने के कारण वाणी से गृहीत नहीं होता और न अन्य इन्द्रियों का ही विषय होता है । तप सभी की प्राप्ति का साधन है; तथापि यह तप से भी ग्रहण नहीं किया जाता और न जिसका महत्त्व सुप्रसिद्ध है उस अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म से ही गृहीत होता है । तो फिर उसके ग्रहण करने में क्या साधन है? इसपर कहते हैं—

ज्ञान (ज्ञान की साधनभूता बुद्धि) के प्रसाद से [उसका ग्रहण हो सकता है] । सम्पूर्ण प्राणियों का ज्ञान स्वभाव से आत्मबोध कराने में समर्थ होने पर भी, बाह्य विषयों के रागादि दोष से कलुषित—अप्रसन्न यानी अशुद्ध हो जाने के कारण उस आत्मतत्त्व का, सर्वदा समीपस्थ होने पर भी, मल से ढके हुए दर्पण तथा चंचल जल के समान बोध नहीं करा सकता । जिस समय इन्द्रिय और विषयों के संसर्ग से होनेवाले रागादि दोषरूप मल के दूर हो जाने पर दर्पण या जल आदि के समान चित्त प्रसन्न—स्वच्छ अर्थात् शान्तभाव से स्थित हो जाता है उस समय ज्ञान का प्रसाद होता है ।

क्योंकि उस ज्ञानप्रसाद से विशुद्धसत्त्व यानी शुद्धचित्त हुआ पुरुष ब्रह्म का साक्षात्कार करनेयोग्य होता है इसलिये तब वह ध्यान करके अर्थात् सत्यादिसाधनसम्पन्न होकर इन्द्रियों का निरोध कर एकाग्रचित्त से ध्यान—चिन्तन करता हुआ उस निष्कल यानी सम्पूर्ण अवयवभेद से रहित आत्मा को देखता—उपलब्ध करता है ॥ ८ ॥

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यस्मान्न चक्षुषा गृह्यते केनचिदप्यरूपत्वान्नापि गृह्यते वाचानभिधेयत्वान्न चान्यैर्देवैरितरेन्द्रियैः । तपसः सर्वप्राप्तिसाधनत्वेऽपि न तपसा गृह्यते । तथा वैदिकेनाग्निहोत्रादिकर्मणा प्रसिद्धमहत्त्वेनापि न गृह्यते । किं पुनस्तस्य ग्रहणे साधनमित्याह—

ज्ञानप्रसादेन । आत्मावबोधनसमर्थमपि स्वभावेन सर्वप्राणिनां ज्ञानं बाह्यविषयरागादिदोषकलुषितमप्रसन्नमशुद्धं सन्नावबोधयति नित्यं संनिहितमप्यात्मतत्त्वं मलावनद्धमिवादर्शनम्, विलुलितमिव सलिलम् । तद्यदेन्द्रियविषयसंसर्गजनितरागादिमलकालुष्यापनयनादादर्शसलिलादिवत्प्रसादितं स्वच्छं शान्तमवतिष्ठते तदा ज्ञानस्य प्रसादः स्यात् ।

तेन ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वो विशुद्धान्तःकरणो योग्यो ब्रह्म द्रष्टुं यस्मात्ततस्तस्मात्तु तमात्मानं पश्यते पश्यत्युपलभते निष्कलं सर्वावयवभेदवर्जितं ध्यायमानः सत्यादिसाधनवानुपसंहृतकरण एकाग्रेण मनसा ध्यायमांश्चिन्तयन् ॥ ८ ॥

शरीर में इन्द्रियरूप से अनुप्रविष्ट हुए आत्मा का चित्तशुद्धिद्वारा साक्षात्कार

जिस आत्मा को साधक इस प्रकार देखता है—
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यमात्मानमेवं पश्यति—