मुण्डक 3 खण्ड 1 - मन्त्र 9

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश ।
प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९ ॥

eṣo’ṇurātmā cetasā veditavyo yasminprāṇaḥ pañcadhā saṃviveśa .
prāṇaiścittaṃ sarvamotaṃ prajānāṃ yasminviśuddhe vibhavatyeṣa ātmā .. 9 ..


वह सूक्ष्म आत्मा, जिस [शरीर]-में पाँच प्रकार से प्राण प्रविष्ट है उस शरीर के भीतर ही विशुद्ध विज्ञान द्वारा जाननेयोग्य है । उससे इन्द्रियों द्वारा प्रजावर्ग के सम्पूर्ण चित्त व्याप्त हैं, जिसके शुद्ध हो जाने पर यह आत्मस्वरूप से प्रकाशित होने लगता है ॥ ९ ॥

वह अणु—सूक्ष्म आत्मा चित्त यानी केवल विशुद्ध ज्ञान से जाननेयोग्य है । वह कहाँ जाननेयोग्य है? जिस शरीर में प्राणवायु, प्राण-अपान आदि भेद से पाँच प्रकार का होकर सम्यक् रीति से प्रविष्ट हो रहा है उसी शरीर में हृदय के भीतर यह चित्त द्वारा जाननेयोग्य है—ऐसा इसका तात्पर्य है ।

वह किस प्रकार के चित्त (ज्ञान) से ज्ञातव्य है? इसपर कहते हैं—दूध जिस प्रकार घृत से और काष्ठ जिस प्रकार अग्नि से व्याप्त है, उसी प्रकार जिससे प्राण यानी इन्द्रियों के सहित प्रजा के समस्त चित्त—अन्तःकरण व्याप्त हैं, क्योंकि लोक में प्रजा के सभी अन्तःकरण चेतनायुक्त प्रसिद्ध हैं और जिस चित्त के शुद्ध यानी क्लेशादि मल से वियुक्त होने पर यह पूर्वोक्त आत्मा अपने विशेषरूप से प्रकट होता है अर्थात् अपने को प्रकाशित कर देता है ॥ ९ ॥

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एषोऽणुः सूक्ष्मश्चेतसा विशुद्धज्ञानेन केवलेन वेदितव्यः । क्वासौ? यस्मिञ्छरीरे प्राणो वायुः पञ्चधा प्राणापानादिभेदेन संविवेश सम्यक्प्रविष्टस्तस्मिन्नेव शरीरे हृदये चेतसा ज्ञेय इत्यर्थः ।

कीदृशेन चेतसा वेदितव्य इत्याह—प्राणैः सहेन्द्रियैश्चित्तं सर्वमन्तःकरणं प्रजानामोतं व्याप्तं येन क्षीरमिव स्नेहेन काष्ठमिवाग्निना । सर्वं हि प्रजानामन्तःकरणं चेतनावत्प्रसिद्धं लोके । यस्मिंश्च चित्ते क्लेशादिमलवियुक्ते शुद्धे विभवत्येष उक्त आत्मा विशेषेण स्वेनात्मना विभवत्यात्मानं प्रकाशयतीत्यर्थः ॥ ९ ॥


आत्मज्ञ का वैभव और उसकी पूजा का विधान

इस प्रकार जो उपर्युक्त सर्वात्मा को आत्मस्वरूप से जानता है उसका सर्वात्मा होने से ही सर्वप्राप्तिरूप फल बतलाते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
य एवमुक्तलक्षणं सर्वात्मानमात्मत्वेन प्रतिपन्नस्तस्य सर्वात्मत्वादेव सर्वावाप्तिलक्षणं फलमाह—