मुण्डक 3 खण्ड 2 - मन्त्र 1

स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १ ॥

sa vedaitatparamaṃ brahma dhāma yatra viśvaṃ nihitaṃ bhāti śubhram .
upāsate puruṣaṃ ye hyakāmāste śukrametadativartanti dhīrāḥ .. 1 ..


वह (आत्मवेत्ता) इस परम आश्रयरूप ब्रह्म को जिसमें यह समस्त जगत् अर्पित है और जो स्वयं शुद्धरूप से भासमान हो रहा है, जानता है ।

जो निष्कामभाव से उस आत्मज्ञ पुरुष की उपासना करते हैं, वे बुद्धिमान् लोग शरीर के बीजभूत इस वीर्य का अतिक्रमण कर जाते हैं । [अर्थात् इसके बन्धन से मुक्त हो जाते हैं] ॥ १ ॥

वह (आत्मवेत्ता) सम्पूर्ण कामनाओं के परम यानी उत्कृष्ट आश्रयभूत इस पूर्वोक्त लक्षणवाले ब्रह्म को जानता है, जिस ब्रह्मपद में यह विश्व यानी सम्पूर्ण जगत् निहित—समर्पित है और जो कि अपने तेज से—शुद्धरूप से प्रकाशित हो रहा है । उस इस प्रकार के आत्मज्ञ पुरुष की भी जो लोग निष्काम अर्थात् ऐश्वर्य की तृष्णा से रहित होकर यानी मुमुक्षु होकर परमदेव के समान उपासना करते हैं वे धीर—बुद्धिमान् पुरुष शुक्र यानी मनुष्यदेह के बीज का, जो कि शरीर के उपादान कारणरूप से प्रसिद्ध है, अतिक्रमण कर जाते हैं, अर्थात् फिर योनि में प्रवेश नहीं करते, जैसा कि “फिर कहीं प्रीति नहीं करता” इस श्रुति से सिद्ध होता है । अतः तात्पर्य यह है कि उसका पूजन करना चाहिये ॥ १ ॥
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स वेद जानातीत्येतद्यथोक्तलक्षणं ब्रह्म परममुत्कृष्टं धाम सर्वकामानामाश्रयमास्पदं यत्र यस्मिन् ब्रह्मणि धाम्नि विश्वं समस्तं जगन्निहितमर्पितं यच्च स्वेन ज्योतिषा भाति शुभ्रं शुद्धम् । तमप्येवमात्मज्ञं पुरुषं ये ह्यकामा विभूतितृष्णावर्जिता मुमुक्षवः सन्त उपासते परमिव सेवन्ते ते शुक्रं नृबीजं यदेतत्प्रसिद्धं शरीरोपादानकारणमतिवर्तन्त्यतिगच्छन्ति धीरा धीमन्तो न पुनर्योनिं प्रसर्पन्ति “न पुनः क्वचिद्रतिं करोति” इति श्रुतेः । अतस्तं पूजयेदित्यभिप्रायः ॥ १ ॥

निष्कामता से पुनर्जन्मनिवृत्ति

कामान्यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र ।

kāmānyaḥ kāmayate manyamānaḥ sa kāmabhirjāyate tatra tatra .


मुमुक्षु के लिये कामना का त्याग ही प्रधान साधन है—इस बात को दिखलाते हैं—
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मुमुक्षोः कामत्याग एव प्रधानं साधनमित्येतद्दर्शयति—