मुण्डक 3 खण्ड 2 - मन्त्र 11

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य

श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतावाथर्वणमुण्डकोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥

॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥

तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते ।
नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११ ॥

tadetatsatyamṛṣiraṅgirāḥ purovāca naitadacīrṇavrato’dhīte .
namaḥ paramaṛṣibhyo namaḥ paramaṛṣibhyaḥ .. 11 ..


उस इस सत्यका पूर्व कालमें अंगिरा ऋषिने [शौनकजीको] उपदेश किया था । जिसने शिरोव्रतका अनुष्ठान नहीं किया वह इसका अध्ययन नहीं कर सकता । परमर्षियोंको नमस् कार है, परमर्षियोंको नमस् कार है ॥ ११ ॥

उस इस अक्षर पुरुष सत्यको अंगिरा नामक ऋषिने पूर्व कालमें अपने समीप विधिपूर्वक आये हुए प्रश्नकर्ता शौनकजीसे कहा था । उनके समान अन्य किसी गुरुको भी उसी प्र कार अपने समीप विधिपूर्वक आये हुए कल्याण कामी मुमुक्षु पुरुषको उसके मोक्षके लिये इसका उपदेश करना चाहिये—यह इसका तात्पर्य है । इस ग्रन्थरूप उपदेशका अचीर्णव्रत पुरुष—जिसने कि शिरोव्रतका आचरण न किया हो—अध्ययन नहीं कर सकता, क्योंकि जिसने उस व्रतका आचरण किया होता है उसीकी विद्या संस् कारसम्पन्न होकर फलवती होती है ।

यहाँ ब्रह्मविद्या समाप्त हुई । वह जिन ब्रह्मा आदिसे परम्पराक्रमसे प्राप्त हुई है उन परमर्षियोंको नमस् कार है । जिन्होंने परब्रह्मका साक्षात् दर्शन किया है और उसका बोध प्राप्त किया है वे ब्रह्मा आदि परम ऋषि हैं; उन्हें फिर भी नमस् कार है । यहाँ ‘नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः’ यह द्विरुक्ति ऋषियोंके अधिक आदर और मुण्डककी समाप्तिके लिये है ॥ ११ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

तदेतदक्षरं पुरुषं सत्यमृषिरङ्गिरा नाम पुरा पूर्वं शौनकाय विधिवदुपसन्नाय पृष्टवत उवाच ।

तद्वदन्योऽपि तथैव श्रेयोऽर्थिने मुमुक्षवे मोक्षार्थं विधिवदुपसन्नाय ब्रूयादित्यर्थः । नैतद्ग्रन्थरूपमचीर्णव्रतोऽचरितव्रतोऽप्यधीते न पठति । चीर्णव्रतस्य हि विद्या फलाय संस्कृता भवतीति ।

समाप्ता ब्रह्मविद्या, सा येभ्यो ब्रह्मादिभ्यः पारम्पर्यक्रमेण संप्राप्ता तेभ्यो नमः परमऋषिभ्यः परमं ब्रह्म साक्षाद्दृष्टवन्तो ये ब्रह्मादयोऽवगतवन्तश्च ते परमर्षयस्तेभ्यो भूयोऽपि नमः । द्विर्वचनमत्यादरार्थं मुण्डकसमाप्त्यर्थं च ॥ ११ ॥

इत्यथर्ववेदीयमुण्डकोपनिषद्भाष्ये तृतीयमुण्डके द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥

॥ समाप्तमिदं तृतीयं मुण्डकम् ॥ ३ ॥