मुण्डक 3 खण्ड 2 - मन्त्र 2

पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २ ॥

paryāptakāmasya kṛtātmanastvihaiva sarve pravilīyanti kāmāḥ .. 2 ..


[भोगों के गुणों का] चिन्तन करनेवाला जो पुरुष भोगों की इच्छा करता है वह उन कामनाओं के योग से तहाँ-तहाँ (उनकी प्राप्ति के स्थानों में) उत्पन्न होता रहता है । परन्तु जिसकी कामनाएँ पूर्ण हो गयी हैं उस कृतकृत्य पुरुष की तो सभी कामनाएँ इस लोक में ही लीन हो जाती हैं ॥ २ ॥

जो पुरुष काम अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट अभीष्ट विषयों की, उनके गुणों का मनन—चिन्तन करता हुआ, कामना करता है वह उन कामनाओं अर्थात् धर्माधर्म में प्रवृत्ति कराने के हेतुभूत विषयों की इच्छारूप वासनाओं के सहित वहीं-वहीं उत्पन्न होता है; अर्थात् जहाँ-जहाँ विषयप्राप्ति के लिये कामनाएँ पुरुष को कर्म में नियुक्त करती हैं वह वहीं-वहीं उन्हीं-उन्हीं प्रदेशों में उन-उन कामनाओं से ही परिवेष्टित हुआ जन्म ग्रहण करता है ।

परन्तु जो परमार्थतत्त्व के विज्ञान से पूर्णकाम हो गया है, अर्थात् आत्मप्राप्ति की इच्छावाला होने के कारण जिसे सब ओर से समस्त भोग प्राप्त हो चुके हैं उस पूर्णकाम कृतकृत्य पुरुष की सभी कामनाएँ लीन हो जाती हैं अर्थात् जिसने विद्याद्वारा अपने आत्मा को उसके अविद्यामय अपररूप से हटाकर अपने पररूप से स्थित कर दिया है उस कृतात्मा के धर्माधर्म की प्रवृत्ति के समस्त हेतु इस शरीर में स्थित रहते हुए ही लीन अर्थात् नष्ट हो जाते हैं । अभिप्राय यह है कि अपनी उत्पत्तिके हेतुका नाश हो जानेके कारण उसमें फिर कामनाएँ उत्पन्न नहीं होतीं ॥ २ ॥

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कामान्यो दृष्टादृष्टेष्टविषयान् कामयते मन्यमानस्तद्गुणांश्चिन्तयानः प्रार्थयते स तैः कामभिः कामैर्धर्माधर्मप्रवृत्तिहेतुभिर्विषयेच्छारूपैः सह जायते तत्र तत्र । यत्र यत्र विषयप्राप्तिनिमित्तं कामाः कर्मसु पुरुषं नियोजयन्ति तत्र तत्र तेषु तेषु विषयेषु तैरेव कामैर्वेष्टितो जायते ।

यस्तु परमार्थतत्त्वविज्ञानात् पर्याप्तकाम आत्मकामत्वेन परि समन्तत आप्ताः कामा यस्य तस्य पर्याप्तकामस्य कृतात्मनोऽविद्यालक्षणादपररूपादपनीय स्वेन परेण रूपेण कृत आत्मा विद्यया यस्य तस्य कृतात्मनस्त्विहैव तिष्ठत्येव शरीरे सर्वे धर्माधर्मप्रवृत्तिहेतवः प्रविलीयन्ति विलयमुपयान्ति नश्यन्तीत्यर्थः । कामास्तज्जन्महेतुविनाशान्न जायन्त इत्यभिप्रायः ॥ २ ॥


आत्मदर्शनका प्रधान साधन—जिज्ञासा

इस प्र कार यदि और सब लाभोंकी अपेक्षा आत्मलाभ ही उत्कृष्ट है तो उसकी प्राप्तिके लिये प्रवचन आदि उपाय अधिकतासे करने चाहिये—ऐसी बात प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है—
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यद्येवं सर्वलाभात्परम आत्मलाभस्तल्लाभाय प्रवचनादय उपाया बाहुल्येन कर्तव्या इति प्राप्त इदमुच्यते—