मुण्डक 3 खण्ड 2 - मन्त्र 4

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् ।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥

nāyamātmā balahīnena labhyo na ca pramādāttapaso vāpyaliṅgāt .
etairupāyairyatate yastu vidvāṃstasyaiṣa ātmā viśate brahmadhāma .. 4 ..


यह आत्मा बलहीन पुरुषको प्राप्त नहीं हो सकता और न प्रमाद अथवा लिंग (संन्यास)-रहित तपस्यासे ही [मिल सकता है] । परन्तु जो विद्वान् इन उपायोंसे [उसे प्राप्त करनेके लिये] प्रयत्न करता है उसका यह आत्मा ब्रह्मधाममें प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
यह आत्मा बलहीन अर्थात् आत्मनिष्ठाजनित शक्तिसे रहित पुरुषद्वारा प्राप्त होनेयोग्य नहीं है; न लौकिक पुत्र एवं पशु आदि विषयोंकी आसक्तिके कारण होनेवाले प्रमादसे ही मिल सकता है और न लिंगरहित तपस्यासे ही । यहाँ तप ज्ञान है और लिंग संन्यास । तात्पर्य यह कि संन्यासरहित ज्ञानसे प्राप्त नहीं होता । जो विद्वान् यानी विवेकी आत्मवेत्ता तत्पर होकर बल, अप्रमाद, संन्यास और ज्ञान—इन उपायोंसे [उसकी प्राप्तिके लिये] प्रयत्न करता है उस विद्वान्‌का यह आत्मा ब्रह्मधाममें सम्यक्-रूपसे प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥
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यस्मादयमात्मा बलहीनेन बलप्रहीणेनात्मनिष्ठाजनितवीर्यहीनेन न लभ्यो नापि लौकिकपुत्रपश्वादिविषयसङ्गनिमित्तप्रमादात्, तथा तपसो वाप्यलिङ्गाल्लिङ्गरहितात् । तपोऽत्र ज्ञानम्; लिङ्गं संन्यासः । संन्यासरहिताज्ज्ञानान्न लभ्यत इत्यर्थः । एतैरुपायैर्बलाप्रमादसंन्यासज्ञानैर्यतते तत्परः सन्प्रयतते यस्तु विद्वान्विवेक्यात्मवित्तस्य विदुष एष आत्मा विशते संप्रविशति ब्रह्मधाम ॥ ४ ॥

आत्मदर्शीकी ब्रह्मप्राप्तिका प्र कार

विद्वान् किस प्र कार ब्रह्ममें प्रविष्ट होता है सो बतलाया जाता है—
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कथं ब्रह्म संविशत इत्युच्यते—