ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५ ॥
saṃprāpyainamṛṣayo jñānatṛptāḥ kṛtātmāno vītarāgāḥ praśāntāḥ .
te sarvagaṃ sarvataḥ prāpya dhīrā yuktātmānaḥ sarvamevāviśanti .. 5 ..
इस आत्माको सम्यक् प्र कारसे प्राप्त कर—जानकर ऋषि अर्थात् आत्मदर्शनवान् लोग, शरीरको पुष्ट करनेवाले किसी बाह्य तृप्तिसाधनसे नहीं बल्कि उस ज्ञानसे ही तृप्त हो कृतात्मा—जिनका आत्मा परमात्मस्वरूपसे ही निष्पन्न हो गया है ऐसे होकर तथा वीतराग—रागादि दोषोंसे रहित और प्रशान्त यानी उपरतेन्द्रिय हो जाते हैं ।
ऐसे भावको प्राप्त हुए वे लोग सर्वग—आ काशके समान सर्वव्यापक ब्रह्मको, उपाधिपरिच्छिन्न एकदेशमें नहीं, बल्कि सर्वत्र प्राप्त कर—फिर क्या होता है? उस अद्वयब्रह्मका ही आत्मभावसे अनुभव कर, वे धीर यानी अत्यन्त विवेकी और युक्तात्मा—नित्य समाहितस्वभाव पुरुष शरीरपातके समय भी सर्वरूप ब्रह्ममें ही प्रवेश कर जाते हैं; अर्थात् घटके फूट जानेपर घटा काशके समान वे अपने अविद्याजनित परिच्छेदका परित्याग कर देते हैं । इस प्र कार वे ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मधाममें प्रवेश करते हैं ॥ ५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
संप्राप्य समवगम्यैनमात्मानमृषयो दर्शनवन्तस्तेनैव ज्ञानेन तृप्ता न बाह्येन तृप्तिसाधनेन शरीरोपचयकारणेन कृतात्मानः परमात्मस्वरूपेणैव निष्पन्नात्मानः सन्तो वीतरागाः वीतरागादिदोषाः प्रशान्ता उपरतेन्द्रियाः ।
त एवंभूताः सर्वगं सर्वव्यापिनमाकाशवत्सर्वतः सर्वत्र प्राप्य—नोपाधिपरिच्छिन्नेनैकदेशेन, किं तर्हि? तद्ब्रह्मैवाद्वयमात्मत्वेन प्रतिपद्य धीरा अत्यन्तविवेकिनो युक्तात्मानो नित्यसमाहितस्वभावाः सर्वमेव समस्तं शरीरपातकालेऽप्याविशन्ति भिन्ने घटे घटाकाशवदविद्याकृतोपाधिपरिच्छेदं जहति । एवं ब्रह्मविदो ब्रह्मधाम प्रविशन्ति ॥ ५ ॥