मुण्डक 3 खण्ड 2 - मन्त्र 6

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६ ॥

vedāntavijñānasuniścitārthāḥ saṃnyāsayogādyatayaḥ śuddhasattvāḥ .
te brahmalokeṣu parāntakāle parāmṛtāḥ parimucyanti sarve .. 6 ..


जिन्होंने वेदान्तजनित विज्ञानसे ज्ञेय अर्थका अच्छी तरह निश्चय कर लिया है वे संन्यासयोगसे यत्न करनेवाले समस्त शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकमें देहत्याग करते समय परम अमरभावको प्राप्त हो सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ६ ॥

वेदान्तसे उत्पन्न होनेवाला विज्ञान वेदान्तविज्ञान कहलाता है । उसका अर्थ यानी विज्ञेय परमात्मा है । वह अर्थ जिन्हें अच्छी तरह निश्चित हो गया है वे ‘वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थ’ कहलाते हैं । वे संन्यासयोगसे— सर्वकर्मपरित्यागरूप योगसे अर्थात् केवल ब्रह्मनिष्ठास्वरूप योगसे यत्न करनेवाले और शुद्धसत्त्व—संन्यासयोगसे जिनका सत्त्व (चित्त) शुद्ध हो गया है ऐसे वे शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोकोंमें परामृत—परम अमृत यानी अमरणधर्मा ब्रह्म ही जिनका आत्मस्वरूप है ऐसे जीवित अवस्थाओंमें ही परामृत यानी ब्रह्मभूत होकर दीपनिर्वाण अथवा [घटके फूटनेपर] घटा काशके समान परिमुक्त यानी निवृत्तिको प्राप्त हो जाते हैं । वे सब परि अर्थात् सब ओरसे मुक्त हो जाते हैं । किसी अन्य गन्तव्य देशान्तरकी अपेक्षा नहीं करते । संसारी पुरुषोंके जो अन्त काल होते हैं वे ‘अपरान्त काल’ हैं उनकी अपेक्षा मुमुक्षुओंके संसारका अन्त हो जानेपर उनका जो देहपरित्यागका समय है वह ‘परान्त काल’ है ।

उस परान्त कालमें वे ब्रह्मलोकोंमें—बहुत-से साधक होनेके कारण यहाँ ब्रह्मलोक यानी ब्रह्मस्वरूप लोक एक होनेपर भी अनेकवत् देखा और प्राप्त किया जाता है । इसीलिये ‘ब्रह्मलो केषु’ इस पदमें बहुवचनका प्रयोग हुआ है, अतः ‘ब्रह्मलो केषु’ का अर्थ है ब्रह्ममें ।

“जिस प्र कार आ काशमें पक्षियोंके और जलमें जलचर जीवके पैर (चरण-चिह्न) दिखायी नहीं देते उसी प्र कार ज्ञानियोंकी गति नहीं जानी जाती” “[मुमुक्षु लोग] संसारमार्गसे पार होनेकी इच्छासे अनध्वग (संसारमार्गमें विचरण न करनेवाले) होते हैं ।” इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे भी यही प्रमाणित होता है ।

परिच्छिन्न साधनसे साध्य होनेके कारण संसारसम्बन्धिनी गति देशपरिच्छिन्ना ही होती है । किन्तु ब्रह्म सर्वरूप होनेके कारण किसी देशपरिच्छेदसे प्राप्तव्य नहीं है । यदि ब्रह्म देशपरिच्छिन्न हो तो मूर्तद्रव्यके समान आदि-अन्तवान्, पराश्रित, सावयव, अनित्य और कृतक सिद्ध हो जायगा । किन्तु ब्रह्म ऐसा हो नहीं सकता । अतः उसकी प्राप्ति भी देशपरिच्छिन्ना नहीं हो सकती; इसके सिवा ब्रह्मवेत्ता लोग अविद्यादि-संसारबन्धनकी निवृत्तिरूप मोक्षकी ही इच्छा करते हैं, किसी कार्यभूत पदार्थकी नहीं ॥ ६ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

वेदान्तजनितविज्ञानं वेदान्तविज्ञानं तस्यार्थः परमात्मा विज्ञेयः सोऽर्थः सुनिश्चितो येषां ते वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः । ते च संन्यासयोगात्सर्वकर्मपरित्यागलक्षणयोगात्केवलब्रह्मनिष्ठास्वरूपाद्योगाद्यतयो यतनशीलाः शुद्धसत्त्वाः शुद्धं सत्त्वं येषां संन्यासयोगात्ते शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु—संसारिणां ये मरणकालास्तेऽपरान्तास्तानपेक्ष्य मुमुक्षूणां संसारावसाने देहपरित्यागकालः परान्तकालस्तस्मिन्परान्तकाले साधकानां बहुत्वान् ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक एकोऽप्यनेकवद् दृश्यते प्राप्यते वा, अतो बहुवचनं ब्रह्मलोकेष्विति ब्रह्मणीत्यर्थः—परामृताः परममृतममरणधर्मकं ब्रह्मात्मभूतं येषां ते परामृता जीवन्त एव ब्रह्मभूताः परामृताः सन्तः परिमुच्यन्ति परि समन्तात्प्रदीपनिर्वाणवद् घटाकाशवच्च निवृत्तिमुपयान्ति । परिमुच्यन्ति परि समन्तान्मुच्यन्ते सर्वे न देशान्तरं गन्तव्यमपेक्षन्ते ।

“शकुनीनामिवाकाशे जले वारिचरस्य च । पदं यथा न दृश्येत तथा ज्ञानवतां गतिः ॥ ” (महा० शा० २३९ ।२४) । “अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः” इति श्रुतिस्मृतिभ्यः ।

देशपरिच्छिन्ना हि गतिः संसारविषयैव, परिच्छिन्नसाधनसाध्यत्वात् । ब्रह्म तु समस्तत्वान्न देशपरिच्छेदेन गन्तव्यम् । यदि हि देशपरिच्छिन्नं ब्रह्म स्यान्मूर्तद्रव्यवदाद्यन्तवदन्याश्रितं सावयवमनित्यं कृतकं च स्यात् । न त्वेवंविधं ब्रह्म भवितुमर्हति । अतस्तत्प्राप्तिश्च नैव देशपरिच्छिन्ना भवितुं युक्ता । अपि चाविद्यादिसंसारबन्धापनयनमेव मोक्षम् इच्छन्ति ब्रह्मविदो न तु कार्यभूतम् ॥ ६ ॥


मोक्षका स्वरूप

तथा मोक्ष कालमें—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
किं च मोक्षकाले—