मुण्डक 3 खण्ड 2 - मन्त्र 8

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय ।
तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८ ॥

yathā nadyaḥ syandamānāḥ samudre’staṃ gacchanti nāmarūpe vihāya .
tathā vidvānnāmarūpādvimuktaḥ parātparaṃ puruṣamupaiti divyam .. 8 ..


जिस प्र कार निरन्तर बहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूपको त्यागकर समुद्रमें अस्त हो जाती हैं उसी प्र कार विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर दिव्य पुरुषको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥
जिस प्र कार बहकर जाती हुई गंगा आदि नदियाँ समुद्रमें पहुँचनेपर अपने नाम और रूपको त्यागकर अस्त—अदर्शन यानी अविशेष भावको प्राप्त हो जाती हैं उसी प्र कार विद्वान् अविद्याकृत नाम-रूपसे मुक्त हो पूर्वोक्त अक्षर (अव्याकृत)-से भी पर उपर्युक्त लक्षणविशिष्ट पुरुषको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥
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यथा नद्यो गङ्गाद्याः स्यन्दमाना गच्छन्त्यः समुद्रे समुद्रं प्राप्यास्तमदर्शनमविशेषात्मभावं गच्छन्ति प्राप्नुवन्ति नाम च रूपं च नामरूपे विहाय हित्वा तथाविद्याकृतनामरूपाद्विमुक्तः सन्विद्वान्परादक्षरात्पूर्वोक्तात्परं दिव्यं पुरुषं यथोक्तलक्षणमुपैति उपगच्छति ॥ ८ ॥

ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है

शंका—कल्याणपथमें अनेकों विघ्न आया करते हैं—यह प्रसिद्ध है । अतः क्लेशों मेंसे किसी-न-किसीके द्वारा अथवा किसी देवादिद्वारा विघ्न उपस्थित कर दिये जानेसे ब्रह्मवेत्ता भी मरनेपर किसी दूसरी गतिको प्राप्त हो जायगा—ब्रह्मको ही प्राप्त न होगा ।

समाधान—नहीं, विद्यासे ही समस्त प्रतिबन्धोंके निवृत्त हो जानेके कारण [ऐसा नहीं होगा] । मोक्ष केवल अविद्यारूप प्रतिबन्धवाला ही है, और किसी प्रतिबन्धवाला नहीं है, क्योंकि वह नित्य और सबका आत्मस्वरूप है ।

इसलिये—

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ननु श्रेयस्यनेके विघ्नाः प्रसिद्धा अतः क्लेशानामन्यतमेनान्येन वा देवादिना च विघ्नितो ब्रह्मविद्प्यन्यां गतिं मृतो गच्छति न ब्रह्मैव ।

न; विद्ययैव सर्वप्रतिबन्धस्यापनीतत्वात् । अविद्याप्रतिबन्धमात्रो हि मोक्षो नान्यप्रतिबन्धः, नित्यत्वादात्मभूतत्वाच्च ।

तस्मात्—