तथा विद्वान्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८ ॥
yathā nadyaḥ syandamānāḥ samudre’staṃ gacchanti nāmarūpe vihāya .
tathā vidvānnāmarūpādvimuktaḥ parātparaṃ puruṣamupaiti divyam .. 8 ..
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ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही है
शंका—कल्याणपथमें अनेकों विघ्न आया करते हैं—यह प्रसिद्ध है । अतः क्लेशों मेंसे किसी-न-किसीके द्वारा अथवा किसी देवादिद्वारा विघ्न उपस्थित कर दिये जानेसे ब्रह्मवेत्ता भी मरनेपर किसी दूसरी गतिको प्राप्त हो जायगा—ब्रह्मको ही प्राप्त न होगा ।
समाधान—नहीं, विद्यासे ही समस्त प्रतिबन्धोंके निवृत्त हो जानेके कारण [ऐसा नहीं होगा] । मोक्ष केवल अविद्यारूप प्रतिबन्धवाला ही है, और किसी प्रतिबन्धवाला नहीं है, क्योंकि वह नित्य और सबका आत्मस्वरूप है ।
इसलिये—
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ननु श्रेयस्यनेके विघ्नाः प्रसिद्धा अतः क्लेशानामन्यतमेनान्येन वा देवादिना च विघ्नितो ब्रह्मविद्प्यन्यां गतिं मृतो गच्छति न ब्रह्मैव ।
न; विद्ययैव सर्वप्रतिबन्धस्यापनीतत्वात् । अविद्याप्रतिबन्धमात्रो हि मोक्षो नान्यप्रतिबन्धः, नित्यत्वादात्मभूतत्वाच्च ।
तस्मात्—