मुण्डक 3 खण्ड 2 - मन्त्र 9

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति ।
तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९ ॥

sa yo ha vai tatparamaṃ brahma veda brahmaiva bhavati nāsyābrahmavitkule bhavati .
tarati śokaṃ tarati pāpmānaṃ guhāgranthibhyo vimukto’mṛto bhavati .. 9 ..


जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है । उसके कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता । वह शोकको तर जाता है, पापको पार कर लेता है और हृदयग्रन्थियोंसे विमुक्त होकर अमरत्व प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥

इस लोकमें जो कोई उस परब्रह्मको जान लेता है—‘वह साक्षात् मैं ही हूँ’ ऐसा समझ लेता है, वह किसी अन्य गतिको प्राप्त नहीं होता । उसकी ब्रह्मप्राप्तिमें देवतालोग भी विघ्न उपस्थित नहीं कर सकते, क्योंकि वह तो उनका आत्मा ही हो जाता है । अतः ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्म ही हो जाता है ।

तथा इस विद्वान्‌के कुलमें कोई अब्रह्मवित् नहीं होता और यह शोकको तर जाता है अर्थात् अनेकों इष्ट वस्तुओंके वियोगजनित सन्तापको जीवित रहते हुए ही पार कर लेता है तथा धर्माधर्मसंज्ञक पापसे भी परे हो जाता है । फिर हृदयाविद्याग्रन्थियोंसे विमुक्त हो अमृत हो जाता है, जैसा कि ‘भिद्यते हृदयग्रन्थिः’ इत्यादि मन्त्रोंमें कहा ही है ॥ ९ ॥

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स यः कश्चिद्ध वै लोके तत्परमं ब्रह्म वेद साक्षादहमेवास्मीति स नान्यां गतिं गच्छति । देवैरपि तस्य ब्रह्मप्राप्तिं प्रति विघ्नो न शक्यते कर्तुम् । आत्मा ह्येषां स भवति । तस्माद्ब्रह्मविद्वान्ब्रह्मैव भवति ।

किं च नास्य विदुषोऽब्रह्मवित्कुले भवति । किं च तरति शोकमनेकेष्टवैकल्यनिमित्तं मानसं सन्तापं जीवन्नेवातिक्रान्तो भवति । तरति पाप्मानं धर्माधर्माख्यम् । गुहाग्रन्थिभ्यो हृदयाविद्याग्रन्थिभ्यो विमुक्तः सन्नमृतो भवतीत्युक्तमेव भिद्यते हृदयग्रन्थिरित्यादि ॥ ९ ॥


विद्याप्रदानकी विधि

तदनन्तर अब ब्रह्मविद्याप्रदानकी विधिका प्रदर्शन करते हुए [इस ग्रन्थका] उपसंहार किया जाता है— यही बात [आगेकी] ऋचाने भी कही है—
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अथेदानीं ब्रह्मविद्यासम्प्रदानविध्युपप्रदर्शनेनोपसंहारः क्रियते । तदेतदृचाभ्युक्तम्—