ha vai tatsarvaṃ vakṣyatīti te ha samitpāṇayo bhagavantaṃ pippalādamupasannāḥ .. 1 ..
भरद्वाज का पुत्र भारद्वाज जो नाम से सुकेशा था; शिबि का पुत्र शैब्य जिसका नाम सत्यकाम था; सूर्य के पुत्र को ‘सौर्य’ कहते हैं उसका पुत्र सौर्यायणि जो गर्गगोत्रोत्पन्न होने से गार्ग्य कहलाता था—यहाँ ‘सौर्यायणिः’ के स्थान में ‘सौर्यायणी’ [ईकारान्त] प्रयोग छान्दस है; अश्वल का पुत्र आश्वलायन जो नाम से कौसल्य था; भृगु का गोत्रज होने से भार्गव जो विदर्भदेश में उत्पन्न होने से वैदर्भि कहलाता था तथा कबन्धी नामक कात्यायन—कत्य का [*युवसंज्ञक] अपत्य [यानी कत्य का प्रपौत्र] जिसका प्रपितामह अभी विद्यमान था । यहाँ ‘युव’ अर्थ में [गोत्रप्रत्ययान्त कात्य शब्द से ‘फक्’ प्रत्यय होकर उसके स्थान में ‘आयन’ आदेश] हुआ है । ये सब ब्रह्मपर अर्थात् अपर ब्रह्म को ही परभाव से प्राप्त हुए और तदनुकूल अनुष्ठान में तत्पर अतएव ब्रह्मनिष्ठ ऋषिगण परब्रह्म का अन्वेषण करते हुए—वह ब्रह्म क्या है? जो नित्य और विज्ञेय है; उसकी प्राप्ति के लिये ही हम यथेच्छ प्रयत्न करेंगे—इस प्रकार उसकी खोज करते हुए, उसे जानने के लिये यह समझकर कि ‘ये हमें सब कुछ बतला देंगे’ आचार्य के पास गये । किस प्रकार गये? [इसपर कहते हैं—] वे सब समित्पाणि अर्थात् जिन्होंने अपने हाथों में समिधा के भार उठा रखे हैं ऐसे होकर पूज्य आचार्य भगवान् पिप्पलाद के समीप गये ॥ १ ॥
> [ * ]: ‘जीवति तु वंश्ये युवा’ (४ । १ । १६३) इस पाणिनि-सूत्र के अनुसार पितामह के जीवित रहते जो पोते के सन्तान होती है उसकी ‘युवा’ संज्ञा है ।