प्रश्न 1 - मन्त्र 1

ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥

ha vai tatsarvaṃ vakṣyatīti te ha samitpāṇayo bhagavantaṃ pippalādamupasannāḥ .. 1 ..


भरद्वाजनन्दन सुकेशा, शिबिकुमार सत्यकाम, गर्गगोत्र में उत्पन्न हुआ सौर्यायणि (सूर्य का पोता), अश्वलकुमार कौसल्य, विदर्भदेशीय भार्गव और कत्य के पोते का पुत्र कबन्धी—ये अपर ब्रह्म की उपासना करनेवाले और तदनुकूल अनुष्ठान में तत्पर छः ऋषिगण परब्रह्म के जिज्ञासु होकर भगवान् पिप्पलाद के पास यह सोचकर कि ये हमें उसके विषय में सब कुछ बतला देंगे, हाथ में समिधा लेकर गये ॥ १ ॥

भरद्वाज का पुत्र भारद्वाज जो नाम से सुकेशा था; शिबि का पुत्र शैब्य जिसका नाम सत्यकाम था; सूर्य के पुत्र को ‘सौर्य’ कहते हैं उसका पुत्र सौर्यायणि जो गर्गगोत्रोत्पन्न होने से गार्ग्य कहलाता था—यहाँ ‘सौर्यायणिः’ के स्थान में ‘सौर्यायणी’ [ईकारान्त] प्रयोग छान्दस है; अश्वल का पुत्र आश्वलायन जो नाम से कौसल्य था; भृगु का गोत्रज होने से भार्गव जो विदर्भदेश में उत्पन्न होने से वैदर्भि कहलाता था तथा कबन्धी नामक कात्यायन—कत्य का [*युवसंज्ञक] अपत्य [यानी कत्य का प्रपौत्र] जिसका प्रपितामह अभी विद्यमान था । यहाँ ‘युव’ अर्थ में [गोत्रप्रत्ययान्त कात्य शब्द से ‘फक्’ प्रत्यय होकर उसके स्थान में ‘आयन’ आदेश] हुआ है । ये सब ब्रह्मपर अर्थात् अपर ब्रह्म को ही परभाव से प्राप्त हुए और तदनुकूल अनुष्ठान में तत्पर अतएव ब्रह्मनिष्ठ ऋषिगण परब्रह्म का अन्वेषण करते हुए—वह ब्रह्म क्या है? जो नित्य और विज्ञेय है; उसकी प्राप्ति के लिये ही हम यथेच्छ प्रयत्न करेंगे—इस प्रकार उसकी खोज करते हुए, उसे जानने के लिये यह समझकर कि ‘ये हमें सब कुछ बतला देंगे’ आचार्य के पास गये । किस प्रकार गये? [इसपर कहते हैं—] वे सब समित्पाणि अर्थात् जिन्होंने अपने हाथों में समिधा के भार उठा रखे हैं ऐसे होकर पूज्य आचार्य भगवान् पिप्पलाद के समीप गये ॥ १ ॥

> [ * ]: ‘जीवति तु वंश्ये युवा’ (४ । १ । १६३) इस पाणिनि-सूत्र के अनुसार पितामह के जीवित रहते जो पोते के सन्तान होती है उसकी ‘युवा’ संज्ञा है ।

तात्पर्य पढ़ें
सुकेशा च नामतः, भरद्वाजस्यापत्यं भारद्वाजः; शैब्यश्च शिबेः अपत्यं शैब्यः सत्यकामो नामतः; सौर्यायणी सूर्यस्तस्यापत्यं सौर्यः तस्यापत्यं सौर्यायणिश्छान्दसः सौर्यायणीति, गार्ग्यो गर्गगोत्रोत्पन्नः, कौसल्यश्च नामतोऽश्वलस्यापत्यमाश्वलायनः; भार्गवो भृगोर्गोत्रापत्यं भार्गवो वैदर्भिः विदर्भे भवः; कबन्धी नामतः, कत्यस्यापत्यं कात्यायनः, विद्यमानः प्रपितामहो यस्य सः युवप्रत्ययः । ते हैते ब्रह्मपरा अपरं ब्रह्म परत्वेन गतास्तदनुष्ठाननिष्ठाश्च ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणाः—किं तत्? यन्नित्यं विज्ञेयमिति तत्प्राप्त्यर्थं यथाकामं यतिष्याम इत्येवं तदन्वेषणं कुर्वन्तस्तदधिगमायैष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीत्याचार्यमुपजग्मुः । कथम्? ते ह समित्पाणयः समिद्भारगृहीतहस्ताः सन्तो भगवन्तं पिप्पलादमाचार्यमुपसन्ना उपजग्मुः ॥ १ ॥