प्रश्न 1 - मन्त्र 10

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते ।
एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १० ॥

athottareṇa tapasā brahmacaryeṇa śraddhayā vidyayātmānamanviṣyādityamabhijayante .
etadvai prāṇānāmāyatanametadamṛtamabhayametatparāyaṇametasmānna punarāvartanta ityeṣa nirodhastadeṣa ślokaḥ .. 10 ..


तथा तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या द्वारा आत्मा की खोज करते हुए वे उत्तरमार्ग द्वारा सूर्यलोक को प्राप्त होते हैं । यही प्राणों का आश्रय है; यही अमृत है, यही अभय है और यही परा गति है । इससे फिर नहीं लौटते; अतः यही निरोधस्थान है । इस विषय में यह [अगला] मन्त्र है— ॥ १० ॥

तथा उत्तरायण से वे प्रजापति के अंश भोक्ता प्राण को यानी आदित्य को प्राप्त होते हैं । किस साधन से प्राप्त होते हैं? तप अर्थात् इन्द्रियजय से; विशेषतः ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और प्रजापतितादात्म्यविषयक विद्या से अर्थात् अपने को स्थावर-जंगम जगत् के प्राण सूर्यरूप से अनुसंधानकर यानी यह समझकर कि यह [सूर्य] ही मैं हूँ आदित्यलोक पर विजय पाते अर्थात् उसे प्राप्त होते हैं ।

निश्चय यही आयतन—सम्पूर्ण प्राणों का सामान्य आयतन यानी आश्रय है । यही अमृत—अविनाशी है, अतः यह अभय—भयरहित है, चन्द्रमा के समान क्षयवृद्धिरूप भययुक्त नहीं है तथा यही उपासकों की और उपासनासहित कर्मानुष्ठान करनेवालों की परा गति है । इस पद को प्राप्त होकर अन्य केवल कर्मपरायणों के समान फिर नहीं लौटते, क्योंकि यह अविद्वानों के लिये निरोध है, क्योंकि उपासनाहीन पुरुष आदित्य से रुके हुए हैं; [ * ] ये लोग आदित्यरूप संवत्सर यानी अपने आत्मा प्राण को प्राप्त नहीं होते ।

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अथोत्तरेणायनेन प्रजापतेः अंशं प्राणमत्तारमादित्यमभिजयन्ते; केन? तपसेन्द्रियजयेन विशेषतो ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया च प्रजापत्यात्मविषयया आत्मानं प्राणं सूर्यं जगतस्तस्थुषश्चान्विष्याहमस्मीति विदित्वादित्यमभिजयन्तेऽभिप्राप्नुवन्ति ।

एतद्वा आयतनं सर्वप्राणानां सामान्यमायतनमाश्रयमेतदमृतमविनाशि । अभयमत एव भयवर्जितं न चन्द्रवत्क्षयवृद्धिभयवत् । एतत्परायणं परा गतिः विद्यावतां कर्मिणां च ज्ञानवताम् । एतस्मान्न पुनरावर्तन्ते यथेतरे केवलकर्मिण इति । यस्मादेषोऽविदुषां निरोधः । आदित्याद्धि निरुद्धा अविद्वांसो नैते संवत्सरमादित्यमात्मानं प्राणमभिप्राप्नुवन्ति ।


वह कालरूप संवत्सर ही अविद्वानों का निरोधस्थान है । तहाँ इस विषय में यह श्लोक यानी मन्त्र प्रसिद्ध है ॥ १० ॥

> [ * ]: अर्थात् वे आदित्यमण्डल को वेधकर नहीं जा सकते ।

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स हि संवत्सरः कालात्माविदुषां निरोधः । तत्तत्रास्मिन्नर्थ एष श्लोको मन्त्रः ॥ १० ॥