प्रश्न 1 - मन्त्र 11

पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् ।
अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११ ॥

pañcapādaṃ pitaraṃ dvādaśākṛtiṃ diva āhuḥ pare ardhe purīṣiṇam .
atheme anya u pare vicakṣaṇaṃ saptacakre ṣaḍara āhurarpitamiti .. 11 ..


अन्य कालवेत्तागण इस आदित्य को पाँच पैरोंवाला, सबका पिता, बारह आकृतियोंवाला, पुरीषी (जलवाला) और द्युलोक के परार्द्ध में स्थित बतलाते हैं तथा ये अन्य लोग उसे सर्वज्ञ और उस सात चक्र और छः अरेवाले में ही इस जगत् को अर्पित बतलाते हैं ॥ ११ ॥

पाँच ऋतुएँ इस संवत्सररूप आदित्य के मानो चरण हैं; इसलिये यह पंचपाद है, क्योंकि उन ऋतुओं से यह चरणों के समान घूमता रहता है । यह [पाँच ऋतुओं की] कल्पना हेमन्त और शिशिर को एक मानकर की है । सबका उत्पत्तिकर्ता होने के कारण उसका पितृत्व है, इसलिये उसे पिता कहा है । बारह महीने उसकी आकृतियाँ, अवयव या आकार हैं, अथवा बारह महीनों द्वारा उसका अवयवीकरण (विभाग) किया जाता है । इसलिये उसे द्वादशाकृति कहा है, तथा वह द्युलोक यानी अन्तरिक्ष से परे—ऊपर के स्थानरूप तीसरे स्वर्गलोक में स्थित है और पुरीषी—पुरीषवान् अर्थात् जलवाला है—ऐसा कालज्ञ पुरुष कहते हैं ।

तथा ये अन्य कालवेत्ता पुरुष उसी को विचक्षण—निपुण यानी सर्वज्ञ बतलाते हैं तथा सप्त अश्वरूप सात चक्र और षडृतुरूप छः अरोंवाले उस निरन्तर गतिशील कालात्मा में ही रथ की नाभि में अरों के समान इस सम्पूर्ण जगत् को अर्पित—निविष्ट बतलाते हैं ।

चाहे पंचपाद और द्वादश आकृतियोंवाला हो अथवा सात चक्र और छः अरोंवाला हो सभी प्रकार चन्द्रमा और सूर्यरूप से भी कालस्वरूप संवत्सरात्मक प्रजापति ही जगत् का कारण है ॥ ११ ॥

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पञ्चपादं पञ्चर्तवः पादा इवास्य संवत्सरात्मन आदित्यस्य तैरसौ पादैर्ऋतुभिरावर्तते । हेमन्तशिशिरावेकीकृत्येयं कल्पना । पितरं सर्वस्य जनयितृत्वात्पितृत्वं तस्य । तं द्वादशाकृतिं द्वादश मासा आकृतयोऽवयवा आकरणं वावयविकरणम् अस्य द्वादशमासैस्तं द्वादशाकृतिं दिवो द्युलोकात्पर ऊर्ध्वेऽर्धे स्थाने तृतीयस्यां दिवीत्यर्थः पुरीषिणं पुरीषवन्तमुदकवन्तमाहुः कालविदः ।

अथ तमेवान्य इम उ परे कालविदो विचक्षणं निपुणं सर्वज्ञं सप्तचक्रे सप्तहयरूपेण चक्रे सततं गतिमति कालात्मनि षडरे षडृतुमत्याहुः सर्वमिदं जगत्कथयन्ति; अर्पितमरा इव रथनाभौ निविष्टमिति ।

यदि पञ्चपादो द्वादशाकृतिर्यदि वा सप्तचक्रः षडरः सर्वथापि संवत्सरः कालात्मा प्रजापतिः चन्द्रादित्यलक्षणोऽपि जगतः कारणम् ॥ ११ ॥


मासादि में प्रजापति आदि दृष्टि

जिसमें यह सम्पूर्ण जगत् आश्रित है वह संवत्सर नामक प्रजापति ही अपने अवयवरूप मास में पूर्णतया परिसमाप्त हो जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यस्मिन्निदं श्रितं विश्वं स एव प्रजापतिः संवत्सराख्यः स्वावयवे मासे कृत्स्नः परिसमाप्यते ।