मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्राणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२ ॥
māso vai prajāpatistasya kṛṣṇapakṣa eva rayiḥ śuklaḥ prāṇastasmādeta ṛṣayaḥ śukla iṣṭaṃ kurvantītara itarasmin .. 12 ..
मास ही प्रजापति है । उसका कृष्णपक्ष ही रयि है और शुक्लपक्ष प्राण है । इसलिये ये [प्राणोपासक] ऋषिगण शुक्लपक्ष में ही यज्ञ किया करते हैं तथा दूसरे [अन्नोपासक] दूसरे पक्ष में यज्ञ करते हैं ॥ १२ ॥
मास ही उपर्युक्त लक्षणोंवाला मिथुनात्मक प्रजापति है । उस मासस्वरूप प्रजापति का एक भाग—कृष्णपक्ष तो रयि—अन्न अथवा चन्द्रमा है तथा दूसरा भाग—शुक्लपक्ष ही प्राण—आदित्य अर्थात् भोक्ता अग्नि है । क्योंकि वे शुक्लपक्षस्वरूप प्राण को सर्वात्मक देखते हैं और उन्हें कृष्णपक्ष भी प्राण से भिन्न दिखलायी नहीं देता इसलिये ये प्राणदर्शी ऋषिलोग कृष्णपक्ष में भी [उसे शुक्लपक्षरूप समझकर ही] अपना इष्ट—याग किया करते हैं । तथा दूसरे ऋषि प्राण का दर्शन नहीं करते; इसलिये वे सबको अदर्शनात्मक कृष्णपक्षरूप ही देखते हैं और शुक्लपक्ष में यागानुष्ठान करते हुए भी इतर यानी कृष्णपक्ष में ही करते हैं ॥ १२ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
मासो वै प्रजापतिर्यथोक्तलक्षण एव मिथुनात्मकः । तस्य मासात्मनः प्रजापतेरेको भागः कृष्णपक्षो रयिरन्नं चन्द्रमाः । अपरो भागः शुक्लपक्षः प्राण आदित्योऽत्ताग्निः । यस्माच्छुक्लपक्षात्मानं प्राणं सर्वमेव पश्यन्ति तस्मात्प्राणदर्शिन एत ऋषयः कृष्णपक्षेऽपीष्टं यागं कुर्वन्ति प्राणव्यतिरेकेण कृष्णपक्षस्तैर्न दृश्यते यस्मात् । इतरे तु प्राणं न पश्यन्तीत्यदर्शनलक्षणं कृष्णात्मानमेव पश्यन्ति । इतरस्मिन् कृष्णपक्ष एव कुर्वन्ति शुक्ले कुर्वन्तोऽपि ॥ १२ ॥