ahorātro vai prajāpatistasyāhareva prāṇo rātrireva rayiḥ prāṇaṃ vā ete praskandanti ye divā ratyā saṃyujyante brahmacaryameva tadyadrātrau ratyā saṃyujyante .. 13 ..
वह मासात्मक प्रजापति भी अपने अवयवरूप दिन-रात्रि में समाप्त हो जाता है ।
पहले की तरह अहोरात्रि भी प्रजापति है— उसका भी दिन ही प्राण—भोक्ता यानी अग्नि है और पूर्ववत् रात्रि ही रयि है । वे लोग दिनरूप प्राण को ही क्षीण करते— निकालते—सुखाते अथवा अपने से पृथक् करके नष्ट करते हैं । कौन? जो कि मूढ़ होकर दिन के समय रति—रति की कारणस्वरूपा स्त्री से संयुक्त होते हैं, अर्थात् मिथुन यानी मैथुन करते हैं । क्योंकि ऐसी बात है इसलिये ऐसा नहीं करना चाहिये— यह प्रासंगिक प्रतिषेध प्राप्त होता है । तथा ऋतुकाल में जो रात्रि के समय रति से संयुक्त होते हैं वह तो ब्रह्मचर्य ही है; अतः प्रशस्त होने के कारण ऋतुकाल में ही स्त्रीगमन करना चाहिये—ऐसी यह प्रासंगीकी विधि है, अब प्रकृत विषय [अगले मन्त्र से] कहा जाता है । वह अहोरात्रात्मक प्रजापति [इस प्रकार क्रमशः परिणाम को प्राप्त होकर] व्रीहि और यव आदि अन्नरूप से स्थित हुआ है ॥ १३ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
सोऽपि मासात्मा प्रजापतिः स्वावयवेऽहोरात्रे परिसमाप्यते ।
अहोरात्रो वै प्रजापतिः पूर्ववत् । तस्याप्यहरेव प्राणोऽत्ताग्नी रात्रिरेव रयिः पूर्ववत् । प्राणंमहरात्मानं वा एते प्रस्कन्दन्ति निर्गमयन्ति शोषयन्ति वा स्वात्मनो विच्छिद्यापनयन्ति; के? ये दिवाहनि रत्या रतिकारणभूतया सह स्त्रिया संयुज्यन्ते मिथुनं मैथुनमाचरन्ति मूढाः । यत एवं तस्मात्तन्न कर्तव्यमिति प्रतिषेधः प्रासङ्गिकः । यद्रात्रौ संयुज्यन्ते रत्या ऋतौ ब्रह्मचर्यमेव तदिति प्रशस्तत्वादृतौ भार्यागमनं कर्तव्यमित्ययमपि प्रासङ्गिको विधिः । प्रकृतं तूच्यते— सोऽहोरात्रात्मकः प्रजापतिर्व्रीहियवाद्यन्नात्मना व्यवस्थितः ॥ १३ ॥