प्रश्न 1 - मन्त्र 15

तद्ये ह वै तत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते ।
तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥

tadye ha vai tatprajāpativrataṃ caranti te mithunamutpādayante .
teṣāmevaiṣa brahmaloko yeṣāṃ tapo brahmacaryaṃ yeṣu satyaṃ pratiṣṭhitam .. 15 ..


इस प्रकार जो भी उस प्रजापतिव्रत का आचरण करते हैं वे [कन्या-पुत्ररूप] मिथुन को उत्पन्न करते हैं । जिनमें कि तप और ब्रह्मचर्य है तथा जिनमें सत्य स्थित है उन्हीं को यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता है ॥ १५ ॥

ऐसी स्थिति होने के कारण जो गृहस्थ उस प्रजापतिव्रत—प्रजापति के व्रत का आचरण करते हैं, यानी ऋतुकाल में स्त्रीगमन करते हैं—यहाँ ‘ह’ और ‘वै’ ये निपात प्रसिद्ध का स्मरण दिलाने के लिये हैं—उन (ऋतुकालाभिगामियों) को यह दृष्ट फल मिलता है ।

क्या फल मिलता है? वे मिथुन यानी पुत्र और कन्या उत्पन्न करते हैं । [इस दृष्ट फल के सिवा] उन इष्ट, पूर्त और दत्त कर्मकर्ताओं को, जिनमें कि स्नातकव्रतादि तप, ऋतुकाल से अन्य समय स्त्रीगमन न करनारूप ब्रह्मचर्य और असत्यत्यागरूप सत्य अव्यभिचरितरूप से प्रतिष्ठित है यह अदृश्य फल मिलता है जो कि चन्द्रलोक में स्थित पितृयाणरूप ब्रह्मलोक है ॥ १५ ॥

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तत्तत्रैवं सति ये गृहस्थाः— ‘ह वै’ इति प्रसिद्धस्मरणार्थौ निपातौ—तत्प्रजापतेर्व्रतं प्रजापतिव्रतमृतौ भार्यागमनं चरन्ति कुर्वन्ति तेषां दृष्टफलमिदम् ।

किम्? ते मिथुनं पुत्रं दुहितरं चोत्पादयन्ते । अदृष्टं च फलमिष्टापूर्तदत्तकारिणां तेषामेव एष यश्चान्द्रमसो ब्रह्मलोकः पितृयाणलक्षणो येषां तपः स्नातकव्रतादीनि, ब्रह्मचर्यम्— ऋतौ अन्यत्र मैथुनासमाचरणं ब्रह्मचर्यम्, येषु च सत्यमनृतवर्जनं प्रतिष्ठितमव्यभिचारितया वर्तते नित्यमेव ॥ १५ ॥


किन्तु जो चन्द्रलोकसम्बन्धी ब्रह्मलोक के समान मलयुक्त और वृद्धिक्षय आदि से युक्त नहीं है बल्कि सूर्य से उपलक्षित उत्तरायणसंज्ञक विरज— विशुद्ध प्राणात्मभाव है वह उन्हें प्राप्त होता है; किन्हें प्राप्त होता है? इसपर कहा जाता है—
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यस्तु पुनरादित्योपलक्षित उत्तरायणः प्राणात्मभावो विरजः शुद्धो न चन्द्रब्रह्मलोकवद्रजस्वलो वृद्धिक्षयादियुक्तोऽसौ तेषां केषामित्युच्यते—