प्रश्न 1 - मन्त्र 16

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥

teṣāmasau virajo brahmaloko na yeṣu jihmamanṛtaṃ na māyā ceti .. 16 ..


जिनमें कुटिलता, अनृत और माया (कपट) नहीं है उन्हें यह विशुद्ध ब्रह्मलोक प्राप्त होता है ॥ १६ ॥
जिस प्रकार अनेकों विरुद्ध व्यवहाररूप प्रयोजनवाला होने से गृहस्थ में जिह्म—कुटिलता यानी वक्रता होना निश्चित है उस प्रकार जिनमें जिह्म नहीं है, गृहस्थों में जिस प्रकार क्रीडादि-निमित्त से होनेवाला अनृत अनिवार्य है वैसा जिनमें अनृत नहीं है तथा जिनमें गृहस्थों के समान माया का भी अभाव है । अपने-आपको बाहर से अन्य प्रकार प्रकट करते हुए जो अन्यथा कार्य करना है वही मिथ्याचाररूपा माया है । इस प्रकार जिन एकान्तनिष्ठ ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और भिक्षुओं में कोई निमित्त न रहने के कारण, माया आदि दोष नहीं हैं उन्हें उनके साधनों की अनुरूपता से ही यह विशुद्ध ब्रह्मलोक प्राप्त होता है । इस प्रकार यह ज्ञान (उपासना)-सहित कर्मानुष्ठान करनेवालों की गति कही । पूर्वोक्त चन्द्रमारूप ब्रह्मलोक तो केवल कर्मठों के लिये ही कहा है ॥ १६ ॥
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यथा गृहस्थानामनेकविरुद्धसंव्यवहारप्रयोजनवत्त्वाज्जिह्मं कौटिल्यं वक्रभावोऽवश्यंभावि तथा न येषु जिह्मम् । यथा च गृहस्थानां क्रीडानर्मादिनिमित्तमनृतमवर्जनीयं तथा न येषु तत् । तथा माया गृहस्थानामिव न येषु विद्यते । माया नाम बहिरन्यथात्मानं प्रकाश्यान्यथैव कार्यं करोति सा माया मिथ्याचाररूपा । मायेत्येवमादयो दोषा येष्वधिकारिषु ब्रह्मचारिवानप्रस्थभिक्षुषु निमित्ताभावान्न विद्यन्ते तत्साधनानुरूपेणैव तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोक इत्येषा ज्ञानयुक्तकर्मवतां गतिः । पूर्वोक्तस्तु ब्रह्मलोकः केवलकर्मिणां चन्द्रलक्षण इति ॥ १६ ॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये प्रथमः प्रश्नः ॥ १ ॥


द्वितीय प्रश्न

भार्गव का प्रश्न—प्रजा के आधारभूत कौन-कौन देवगण हैं?

प्राण भोक्ता प्रजापति है—यह पहले कहा । उसका प्रजापतित्व और भोक्तृत्व इस शरीर में ही निश्चित करना चाहिये—इसीलिये यह प्रश्न आरम्भ किया जाता है—
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प्राणोऽत्ता प्रजापतिरित्युक्तम् । तस्य प्रजापतित्वमत्तृत्वं च अस्मिञ्शरीरेऽवधारयितव्यमिति अयं प्रश्न आरभ्यते—