तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान्पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥
tānha sa ṛṣiruvāca bhūya eva tapasā brahmacaryeṇa śraddhayā saṃvatsaraṃ saṃvatsyatha yathākāmaṃ praśnānpṛcchata yadi vijñāsyāmaḥ sarvaṃ ha vo vakṣyāma iti .. 2 ..
कहते हैं, उस ऋषि ने उनसे कहा—‘तुम तपस्या, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से युक्त होकर एक वर्ष और निवास करो; फिर अपनी इच्छानुसार प्रश्न करना, यदि मैं जानता होऊँगा तो तुम्हें सब बतला दूँगा’ ॥ २ ॥
इस प्रकार अपने समीप आये हुए उन लोगों से पिप्पलाद ऋषि ने कहा—‘यद्यपि तुमलोग पहले से ही तपस्वी हो तो भी तप—इन्द्रियसंयम, विशेषतः ब्रह्मचर्य से तथा श्रद्धा यानी आस्तिकबुद्धि से आदरयुक्त होकर गुरुशुश्रूषा में तत्पर रह एक वर्ष और भी निवास करो । फिर अपनी इच्छानुसार अर्थात् जिसकी जैसी इच्छा हो उसका अतिक्रमण न करते हुए—जिसकी जिस विषय में जिज्ञासा हो उसी विषय में प्रश्न करना । यदि मैं तुम्हारे पूछे हुए विषय को जानता होऊँगा तो तुम्हें तुम्हारी पूछी हुई सब बात बतला दूँगा ।’ यहाँ ‘यदि’ शब्द अपनी नम्रता प्रकट करने के लिये है अज्ञान या संशय प्रदर्शित करने के लिये नहीं, जैसा कि आगे प्रश्न का निर्णय करने से स्पष्ट हो जाता है ॥ २ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तानेवमुपगतान्ह स किल ऋषिरुवाच भूयः पुनरेव यद्यपि यूयं पूर्वं तपस्विन एव तपसेन्द्रियसंयमेन तथापीह विशेषतो ब्रह्मचर्येण श्रद्धया चास्तिक्यबुद्ध्यादरवन्तः संवत्सरं कालं संवत्स्यथ सम्यग्गुरुशुश्रूषापराः सन्तो वत्स्यथ । ततो यथाकामं यो यस्य कामस्तमनतिक्रम्य यथाकामं यद्विषये यस्य जिज्ञासा तद्विषयान्प्रश्नान्पृच्छत । यदि तद्युष्मत्पृष्टं विज्ञास्यामः—अनुद्धतत्वप्रदर्शनाथों यदिशब्दो नाज्ञानसंशयार्थः प्रश्ननिर्णयादवसीयते—सर्वं ह वो वः पृष्टं वक्ष्याम इति ॥ २ ॥