रयिं च प्राणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४ ॥
tasmai sa hovāca prajākāmo vai prajāpatiḥ sa tapo’tapyata sa tapastaptvā sa mithunamutpādayate .
rayiṃ ca prāṇaṃ cetyetau me bahudhā prajāḥ kariṣyata iti .. 4 ..
अपने से इस प्रकार प्रश्न करनेवाले कबन्धी से उसकी शंका निवृत्त करने के लिये पिप्पलाद मुनि ने कहा—प्रजाकाम अर्थात् अपनी प्रजा रचने की इच्छावाले प्रजापति ने ‘मैं सर्वात्मा होकर जगत् की रचना करूँ’ इस प्रकार के विज्ञान से सम्पन्न, यथोक्त कर्म करनेवाला (जगद्रचना में उपयुक्त ज्ञान और कर्म के समुच्चय का अनुष्ठान करनेवाला) तद्भावभावित (पूर्वकल्पीय प्रजापतित्व की भावना से सम्पन्न) और कल्प के आदि में हिरण्यगर्भरूप से उत्पन्न होकर तथा रची जानेवाली सम्पूर्ण स्थावर-जंगम प्रजा का पति होकर जन्मान्तर में भावना किये श्रुत्यर्थविषयक ज्ञानरूप तप को तपा अर्थात् उस ज्ञान का स्मरण किया ।
तदनन्तर इस प्रकार तपस्या कर अर्थात् श्रुतिप्रकाशित ज्ञान का स्मरण कर उसने सृष्टि के साधनभूत मिथुन—जोड़े को उत्पन्न किया । उसने रयि यानी सोमरूप अन्न और प्राण यानी भोक्ता अग्नि को रचा, अर्थात् यह सोचकर कि ये भोक्ता और भोग्यरूप अग्नि और सोम मेरी नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करेंगे अण्ड के उत्पत्तिक्रम से सूर्य और चन्द्रमा को रचा ॥ ४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
तस्मा एवं पृष्टवते स होवाच तदपाकरणायाह । प्रजाकामः प्रजा आत्मनः सिसृक्षुर्वै प्रजापतिः सर्वात्मा सज्जगत्स्रक्ष्यामि इत्येवं विज्ञानवान्यथोक्तकारी तद्भावभावितः कल्पादौ निर्वृत्तो हिरण्यगर्भः सृज्यमानानां प्रजानां स्थावरजङ्गमानां पतिः सज्जन्मान्तरभावितं ज्ञानं श्रुतिप्रकाशितार्थविषयं तपोऽन्वालोचयदतप्यत ।
अथ तु स एवं तपस्तप्त्वा श्रौतं ज्ञानमन्वालोच्य सृष्टिसाधनभूतं मिथुनमुत्पादयते मिथुनं द्वन्द्वमुत्पादितवान् । रयिं च सोममन्नं प्राणं चाग्निमत्तारम् एतावग्नीषोमावत्त्रन्नभूतौ मे मम बहुधानेकधा प्रजाः करिष्यत इत्येवं संचिन्त्याण्डोत्पत्तिक्रमेण सूर्याचन्द्रमसावकल्पयत् ॥ ४ ॥