आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५ ॥
ādityo ha vai prāṇo rayireva candramā rayirvā etat sarvaṃ yanmūrtaṃ cāmūrtaṃ ca tasmānmūrtireva rayiḥ .. 5 ..
निश्चय आदित्य ही प्राण है और रयि ही चन्द्रमा है । यह जो कुछ मूर्त (स्थूल) और अमूर्त (सूक्ष्म) है सब रयि ही है; अतः मूर्ति ही रयि है ॥ ५ ॥
यहाँ निश्चयपूर्वक आदित्य ही प्राण अर्थात् भोक्ता अग्नि है और रयि ही चन्द्रमा है । रयि ही अन्न है और वह चन्द्रमा ही है । यह भोक्ता (अग्नि) और अन्न एक ही है । एक प्रजापति ही यह मिथुनरूप हो गया है, इसमें भेद केवल गौण और प्रधान भाव का ही है । सो किस प्रकार? [इसपर कहते हैं—] यह सब रयि—अन्न ही है । वह क्या है? यह जो मूर्त यानी स्थूल है और जो अमूर्त यानी सूक्ष्म है वह मूर्त और अमूर्त भोक्ता-भोग्यरूप होने पर भी रयि ही है । अतः इस प्रकार विभक्त हुए अमूर्त से अन्य जो मूर्तरूप है वही रयि—अन्न है; क्योंकि वह अमूर्त भोक्ता से भोगा जाता है ॥ ५ ॥
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तत्रादित्यो ह वै प्राणोऽत्ता । अग्निः । रयिरेव चन्द्रमाः, रयिः एवान्नं सोम एव । तदेतदेकमत्ता चान्नं च, प्रजापतिरेकं तु मिथुनम्, गुणप्रधानकृतो भेदः । कथम्? रयिर्वा अन्नं वा एतत् सर्वम्; किं तद्यन्मूर्तं च स्थूलं चामूर्तं च सूक्ष्मं च मूर्तामूर्ते अत्त्रन्नरूपे रयिरेव । तस्मात्प्रविभक्ताद् अमूर्ताद्यदन्य- न्मूर्तरूपं मूर्तिः सैव रयिरमूर्तेनाद्यमानत्वात् ॥ ५ ॥
इसी प्रकार अमूर्त प्राणरूप भोक्ता भी जो कुछ अन्न है वह सभी है । किस प्रकार—
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तथामूर्तोऽपि प्राणोऽत्ता सर्वमेव यच्चान्नम् । कथम्—